उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

१. कोई ख्वाहिश .........2.ना ख्वाहिश.........(ग़ज़ल युग्म )

१।

कोई ख्वाहिश, कोई उम्मीद, कुछ अरमान बाकी है
रहेगा कुछ न कुछ बाक़ी, ये जब तक जान बाक़ी है
कोई ख्वाहिश.....................................................

हजारों मिल चुके ,बिछुडे हजारों, मुझ से मिल मिल कर
हजारों की मगर मुझ से अभी, पहचान बाकी है
कोई ख्वाहिश....................................................

कोई नगमा नया फूटेगा , दिल की वादियों में से
कोई तो ख्वाब सच होकर , हमारे सामने होगा
की सूने घर में आना,एक नया मेहमान बाक़ी है
कोई ख्वाहिश .................................................

सदा उसको कहाँ से दूँ , पुकारूँ मैं उसे कैसे
नज़र के सामने मेरे, कभी एक बार वो आए
मैं उसको जानता हूँ ,मुझसे जो अनजान बाकी है
कोई ख्वाहिश................................................
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२. ना ख्वाहिश..........................................

ना ख्वाहिश ना कोई उम्मीद, न अरमान बाकी है
सभी कुछ लुट चुका अपना, फ़क़त अब जान बाकी है
ना................................................................

ना मिलने की तमन्ना है , मिले क्यूँ कोई आ मुझसे
बचा है क्या हमारे पास ,क्यूँ पहचान बाकी है
ना ख्वाहिश..................................................

कोई तारा नया किस्मत का टूटेगा ये ज़ाहिर है
नया एक ख्वाब ,चकनाचूर होकर ,खाक में होगा
मुहोब्बत के लिए , कोई नया बलिदान बाकी है
ना ख्वाहिश....................................................

किसको सदा दूँ ,कौन आएगा ,कहाँ से अब
मेरे टूटे हुए दिल को, यहाँ पर कौन जोडेगा
धड़कते दिल का हो जाना, अभी बेजान बाकी है
ना ख्वाहिश..................................................

उपरोक्त दोनों रचनाएँ १९८१-८२ में लिखी गईं, पहली रचना १९८२ में आल इंडिया रेडियो से संगीत बद्ध होकर प्रसारित हुई, तथा मेरी प्रथम प्रकाशित पुस्तक "तुम्हारे लिए " से ली गईं हैं। ---- योगेश स्वप्न



3 टिप्‍पणियां:

hempandey ने कहा…

'हजारों मिल चुके ,बिछुडे हजारों, मुझ से मिल मिल कर
हजारों की मगर मुझ से अभी, पहचान बाकी है' - बहुत अच्छी पंक्तियाँ हैं. साधुवाद.

"अर्श" ने कहा…

योगेश जी दोनों ही ग़ज़ल बेहद उम्दा बहोत खूब लिखा है आपने दोनों का मतला तो कमाल का है..
ढेरो बधाई कुबूल फरमाएं...


अर्श

विनय ने कहा…

पढ़ा, शब्द प्रयोग अच्छा है

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चाँद, बादल और शाम
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