घुप अँधेरे दिख रही, ज्योति एक अनूप
उस ज्योति में दीखते, सकल नाम, सब रूप
बिन जिव्हा बिन मुख किया ,प्रेम सुधा का पानलगते लगते लग गया , श्याम रूप पर ध्यान
चातक को स्वांति मिली,मिला दिव्य वरदान
अपना आपा खो गया, मिला परम सोपान
जिस क्षण मेरी हो गई , कान्हा से पहचान
पल भर में ही हो गया, अपने से अनजान
देख देख हैरान हूँ परम पिता की शान
नाम लेत ही आ गई, होठों पर मुस्कान
कान्हा ने जब छेड़ दी, वंशी की म्रदु तान
जड़ चेतन सब हो गए, स्वर सुनकर निष्प्राण
प्रेम प्यार के इस तरह, प्रभु ने छोडे बाण
अब मन में भगवान् हैं , कहाँ गया शैतान.
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प्रेम प्यार के इस तरह, प्रभु ने छोडे बाण
अब मन में भगवान् हैं , कहाँ गया शैतान.
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18 टिप्पणियाँ:
बेहतरीन समर्पण की रचना. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति
Verma ji se sahmat hun..jo hai, hamare antarman me..jise ham bahar khojte hain..vikaron ko bhagn kare wahi bhagwaan..!
प्रभु इसी तरह आप पर प्रेम प्यार के वाण छोडते रहें बहुत सुन्दर प्रभु रस मे डूबी कवुता के लिये बधाई
मन और तन मे अनुराग भर दी आपकी रचना ने .......समर्पण है !बधाई!
हलाकि मेरी कोई हस्ती नहीं साहित्य में और ना ही लेखन कला में मगर हर गाम पर जब भी आपको पढता हूँ तो मन अति प्रसन्न हो जाता है... और इसलिए आपको भजन सम्राट कहना चाह रहा हूँ.. गलती के लिए मुआफी ...
अर्श
जिस क्षण मेरी हो गई , कान्हा से पहचान
पल भर में ही हो गया, अपने से अनजान .......
जब उस प्रभु से पहचान हो गयी तो फिर अपने से अनजान हो तो भी क्या .......... सुन्दर होते हैं आपके गीत कृष्ण को समर्पित ........ नमस्कार
बढिया दोहे कहने लगे हैं आप. बांके बिहारी जी की कृपा है आप पर.
बहुत सुन्दर रचना . आभार
har dohaa apne aap mei
mukammel hai
badhaaee
Apki bhav-bhini kavita padhkar main to krishnamay ho gai....bahut sundar .
sundar ati sundar ..man darpan kas diya
बहुत सुंदर कविता है. बधाई.
"लगते लगते लग गया श्याम रूप पर ध्यान
चातक को स्वाति मिली, मिला दिव्य वरदान
बिना जिह्वा बिन मुख किया प्रेम सुधा का पान
अपना आप खो गया, मिला परम सोपान"
क्या बात है!
भक्ति व समर्पण से ओत-प्रोत भाव विह्वल करती रचना.
बहुत सुंदर..........बधाई
बहुत सुन्दर भक्ति-भाव में डूब कर लिखी रचना है... बधाई...!
click nahi ho paa rahi kuchh lines .kuchh panktiya bahut shaandar hai ,ati uttam dohe ,phir jyoti hi vyapt hai to kya kahane .
घुप्प अंधेरे दीखती ज्योति एक अनूप।
डस ज्योति में दीखते सकल नाम सब रूप।।
जिस क्षण मेरी हो गई कान्हा से पहचान।
पल भर भर में ही हो गया अपने से अनजान।।
बहुत सुन्दर और संपूर्ण ध्यान के दोहे हैं।
जो बात दिल से निकलती है वह दिलों तक जाने में समर्थ होती हैं ।
प्रभु का घर है किसका डर है गा भजन मन गा भजन
इसमें किसकी ठेकेदारी हो मगन हो जा मगन
शाश्वत दोहे...सदा-सदा गुने जानेवाले, गाये जानेवाले!
मन अति प्रसन्न हो गया है... और इसलिए आपको
धन्य्वाद.
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