आशिक हूँ मैं इश्क-ए-हकीकी
जिसमें लगती दुनिया फीकी
किसी को लगती माया जैसी
किसी को लगती स्वप्न सरीखी
आशिक हूँ मैं......................
कोई कहता सत्य यही है
कोई कहता सत्य वही है
नेति नेति कह सब हारे
जैसी देखी, वैसी दीखी
आशिक हूँ मैं..................
नहीं जानते इश्क बला क्या
भीतर-भीतर कोई जला क्या
वो ही चंगा हुआ दवा पी
जिसने हँस, कड़वी और तीखी
आशिक हूँ मैं......................
ये दुनियावी प्यार नहीं है
दो बाहों का हार नहीं है
सागर में अपना सब खोकर
जाने क्यूँ नदिया ना चीखी
आशिक हूँ मैं.....................
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दिल चुरा कर ले गया , मेरा वो मेरे सामने
चोरी थी? डकैती थी?, वो मेरी सहमती थी
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अपनी हस्ती को मिटा कर सब को रौशन कर गया
दूसरों के काम आओ , कह गया बुझता चिराग.
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15 टिप्पणियाँ:
बेहद उम्दा रचना । बधाई
ये दुनिया प्यार नहीं
दोबाहों का हार नहीं -----
बहुत सुन्दर और लाजवाब रचना है बधाई
'कोई कहता सत्य यही है
कोई कहता सत्य वही है
नेति नेति कह सब हारे
जैसी देखी, वैसी दीखी'
satya kahaa!
-jeevan ke darshnik bhaav liye bahut sundar geet likha hai.
बुझते चिराग से वाकई सीख लेने की जरूरत है
Taal-sur me gaa saken aisee sundar rachna...waaqayee bayaan kartee ek haqeeeqat !
दिल चुरा कर ले गया , मेरा वो मेरे सामने
चोरी थी? डकैती थी?, वो मेरी सहमती थी ...
Swapan ji ye baat to dil churaane wale ko dekh kar hi bataai ja sakti hai ....
Bahoot khoob likha hai ...
bahut hi sundar bhavnayein.
उम्दा लिखा..
कविता पसंद आई, खास कर दुसरा और तिसरा स्तॅन्ज़ा. बधाई.
वाह वाह क्या सहमति थी
बहुत सुंदर रचना लिखा है आपने ! हर एक पंक्तियाँ लाजवाब है! बहुत बढ़िया लगा!
आज छोटी ही टिप्पणी करेंगे!
NICE.
aakhri chaar line bahut hi shaandar hai
ये दुनियावी प्यार नहीं है
दो बाहों का हार नहीं है
सागर में अपना सब खोकर
जाने क्यूँ नदिया ना चीखी
आशिक हूँ मैं.....................
saadhuvaad
Wah Swapan g wah...
इश्क- ए- हकीकी का जवाब नही ं
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