धीरे-धीरे वंशी की धुन, चुरा रही है मेरा दिल
धीरे-धीरे वंशी की धुन, चुरा रही है मेरा दिल
कहाँ छुप गया मनमोहन तू, जली जा रही मैं तिल तिल
धीरे-धीरे वंशी की धुन, चुरा रही है मेरा दिल..............
सुनकर ये आवाज़ निराली, दिल धक् धक् करने लगता है
निर्देशित -सा हर पग मेरा, तेरी और बढ़ने लगता है
ना बुद्धि पर जोर रहा है
ना वश में है मेरा दिल
धीरे-धीरे वंशी की धुन चुरा रही है मेरा दिल.............
सात सुरों का जाल तुम्हारा,, मुझको कैद किये जाता है
कोई प्रार्थना कोई निवेदन, ना माने कैसा नाता है
तुझको पाकर मनमोहन क्यूँ
मैं जाती फूलों -सी खिल
धीरे-धीरे वंशी की धुन, चुरा रही है मेरा दिल..................
बिन धागे खिंचती आती हूँ, सम्मोहित-सी तेरी और
बाँध दिया कैसे बंधन में, थाम के मेरी जीवन डोर
बनी बावरी भटक रही हूँ
कान्हा जल्दी आके मिल
धीरे-धीरे वंशी की धुन, चुरा रही है मेरा दिल............
*****************




9 टिप्पणियाँ:
भक्तिमय सुन्दर रचना
वाह...!
बहुत खूबसूरत भजन है!
सराबोर हो गये!
भावपूर्ण रचना! सुन्दर!
वाह!!!!!!!!
बिढया भजन।
डूब कर लिखा है भक्ति रस में बहुत खूब.... अच्छा है......
श्री कृष्ण के प्रेम में डूब कर लिखी लाजवाब रचना ...... भक्तिमय हो उठा है आपका ब्लॉग .....
aapka koi paar nahi paa sakta is hunar me ,krishnmaye poora mahaul kar deta hai ye blog .
बहुत ही सुंदर और भक्तिमय भजन!
नववर्ष की आप सभी को हार्दिक शुभकामना - महेन्द्र मिश्र
एक टिप्पणी भेजें