पुरानी डायरी से एक और रचना.
अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक
बात दिल की ना कहोगे, कब तलक
आग भड़का दी है ऐसी, प्रीत ने
प्रीत में जलते रहोगे, कब तलक
अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक............
आरज़ू कर लो कभी तो, स्वप्न की
या उन्हें दे दो दुआएं, दफ़्न की
प्रीत में , लेकर उन्हें भी, साथ अपने
आपको छलते रहोगे, कब तलक
अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक..........
प्यार से तुमको कोई जब, दे सदायें
खुशनसीबी जान उसको, दो दुआएं
पास उसके जाके ना ,तड़पा के उसको
हाथ यूँ मलते रहोगे, कब तलक
अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक...........................
वक़्त है ठहरा हुआ, उसको पकड़ लो
प्रीत के बंधन को, बाहों में जकड लो
हमसफ़र है साथ, चलने को तुम्हारे
ऐकले चलते रहोगे, कब तलक
अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक.......................
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वो गली से मेरी ऐसे , गए बिना पद-चाप
ज्यों ब्लॉगिंग में पाठक , बिना टिप्पणी छाप
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17 टिप्पणियाँ:
अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक
बात दिल की ना कहोगे, कब तलक
bahut sundar shabd aur bhav.
वक़्त है ठहरा हुआ, उसको पकड़ लो
प्रीत के बंधन को, बाहों में जकड लो..
बहुत खूब ......... प्यार की सच मच कलेजे के पास रखना चाहिए ....... बड़ी मुश्किल से मिलता है ....... लाजवाब पंक्तियाँ हैं ......
बेहतरीन रचना
पुरानी डायरी के पन्ने यूँ ही पलटते रहिये
वक्त कहाँ ठहरा है भाई, ये तो चलता रहता है और चाहने पर भी रुकता नहीं.
पुराने चावलों की महक बरकरार है!
आरज़ू कर लो कभी तो, स्वप्न की
या उन्हें दे दो दुआएं, दफ़्न की
वक़्त है ठहरा हुआ, उसको पकड़ लो
प्रीत के बंधन को, बाहों में जकड लो
- वाह.
क्या कहने क्या कहने वाह वाह
मान लिया भाई साहब कि यह पुरानी डायरी का है
नई डायरी मे इतनी मस्त नज्म !
..भगवान बचाए.
बहुत सुन्दर रचना ..उम्दा लिखते रहिये ... आभार योगेश जी...
बहुत प्यारा सा प्रेम गीत मेरी सुबह रंगीन बना गया. बधाई योगेश जी इस शानदार-जानदार रचना के लिए.आपने इतने कठिन भावों और विचारों को, इतनी आसानी से गीत का रूप दे दिया कि जलन होने लगी.
बहुत अरसे बाद नेट पर आना हो सका है, कुछ बीमारी कुछ रोज़गार, दोनों ने सवा महीने निकाल दिए, माफ़ कीजिएगा, आप तक बहुत देर में आया हूँ.
अजनवी बने रह कर और दिल की बात अपनो से न कह कर आदमी सच ही खुदको छलता है ।अगर अपने पास कुछ देने को है देदो नही तो दिल तो दो ,मीठी वाणी दो उसे तडपाओ तो मत । वक्त और हमसफ़र का बडा गहरा रिश्ता है ,मै चला था तो मेरे साथ चले थे कितने ! और मै गिरा था तो मुझे आये उठाने कितने ?उत्तम रचना
... बहुत खूब, प्रसंशनीय !!!!
अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक
बात दिल की ना कहोगे, कब तलक
वक़्त है ठहरा हुआ, उसको पकड़ लो
प्रीत के बंधन को, बाहों में जकड लो..
bahut khoobsurat
बहुत खूब सुन्दर रचना है
आग भडका दी है ऐसी प्रीत ने
प्रीत में जलते रहोगे कब तक....॥
वक़्त है ठहरा हुआ , उसको पकड़ लो
प्रीत के बंधन को बाहों में जकड लो
हमसफ़र है साथ चलने को तुम्हारे
ऐकले चलते रहोगे कब तलक....
वाह जनाब .....
बहुत ही सुन्दर और जानदार शब्दों से सजा हुआ
आपका ये नव-गीत .....
मन ki गहराईयों तक उतर गया है......
बार-बार पढने को दिल करता है
बधाई स्वीकारें .
'मुफ़लिस'
Wahwa..achhi rachna..
अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक..........
Bahut Sundar.
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