दूसरों में क्यूँ बुराई खोजता
दूसरों में क्यूँ बुराई खोजता
अपने भीतर भी कभी तो झांक ले
सबके अपने कर्म हैं अपने हैं फल
अपने कर्मों को भी थोडा आँक ले
दूसरों में क्यूँ बुराई खोजता..............................
रब अगर करता है सब, "कर्ता" है "वो"
क्यूँ किसी को और "कर्ता" मानता
"उसकी" इच्छा से सभी कुछ हो रहा
"उसकी" खूँटी पर सभी कुछ टाँक ले
दूसरों में क्यूँ बुराई खोजता.............................
तू है क्या हस्ती है क्या तेरी यहाँ
कीट-सा गोबर का, फूले जा रहा
"उसको" अर्पित कर है जो "उसको" प्रिय
चाहे मस्तक ले वो चाहे नाक ले
दूसरों में क्यूँ बुराई खोजता........................
मन क्यूँ आवारा सा भटका सा फिरे
क्या पता किस ओर वो जाकर गिरे
इसको बस में कर, लगामें कस के रख
हो सके रब कि दिशा में हांक ले
दूसरों में क्यूँ बुराई खोजता.....................
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16 टिप्पणियाँ:
योगेश जी
बहुत सुन्दर रचना ... आभार
bahut sunder sir...sacchi baat kahi aapne
सत्य वचन हर मनुष्य खुद को सुधारें सारा समाज अपने आप सुधार जाएगा..सुंदर रचना...धन्यवाद योगेश जी
दूसरों में बुराई खोजना बुरी बात है ।
स्वप्न जी
सही लिखा है आपने आदमी अगर अपने भीतर झाँकना सीख ले तो वह दूसरों की बुराई नही अच्छाई देखना सीख लेगा
सुमन ‘मीत’
ढलती शाम -http://sumanmeet.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html
दूसरों में क्यूँ बुराई खोजता................
बुरा जो देखन मै गया. मुझ सा बुरा न कोय.
सुन्दर सन्देश देती रचना
प्रेरक गीत!
बहुत सुन्दर!
Ye dil ye pagal dil..avargee...! Sadiyonse insaan doosaron me hee burayiyan khojta raha hai!
sach hai, Insan ki aukat hi kya hai....is vishaal duniya me...sab kathputli hai...
बेहतरीन रचना...
सुंदर कविता. धन्यवाद.
उसकी" इच्छा से सभी कुछ हो रहा
"उसकी" खूँटी पर सभी कुछ टाँक ले
दूसरों में क्यूँ बुराई ..
बेहद उम्दा योगेश जी !
भक्ति भाव पूर्ण बेहद सुंदर गीत !
[इनको अपने स्वर में भी सुनाएँ कभी.]
शीर्षक से ही उम्दा रचना लगी, पढ़ कर पता चला की क्या गहराई है. ऐसी रचना के लिए हार्दिक धन्यवाद्.
दूसरों में क्यूँ बुराई खोजता
दूसरों में क्यूँ बुराई खोजताअपने भीतर भी कभी तो झांक लेसबके अपने कर्म हैं अपने हैं फलअपने कर्मों को भी थोडा आँक लेदूसरों में क्यूँ बुराई खोजता..............................
bahut sundar sandesh ,mano mere man ki kah di aapne .sundar man ka pratik hai aese bhav .umda
काश कि हम सब इस बात को अपने जीवन में उतर पाते....जीवन-मर्म को बोध कराती कविता....प्रभावी अभिव्यक्ति !
यह आत्मालोचन की रचना है ।
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