इस दुनिया में अपना कोई घर ना बने तो अच्छा है

इस दुनिया में अपना कोई घर ना बने तो अच्छा है
( आत्म - चिंतन)

इस दुनिया में अपना कोई, घर ना बने तो अच्छा है
जो फक्कड़ बन घूम रहा है , वो ही साधू सच्चा है

ये दुनिया परदेस है इसमें ,रहने कि क्यूँ ठान रहा
सभी पराया है इस जग का, जिसको अपना मान रहा

ये सपनों कि नगरी इसमें ,भटक कहीं ना खो  जाना
जाग, लौट  चल, युगों- युगों को, परदेसी ना हो जाना

झूठ और मक्कारी के बल, लगी रूपये कि ढेरी है
अभी संभल जा बन्दे, माया, तेरी है ना मेरी है

तेरे साथ आया है तेरा मीत , उसे क्यूँ भुला दिया
अपने भीतर झाँक जगा ले, तूने उसको सुला दिया

वो सच्चा है मीत तेरा जो,, हर पल साथ तेरे रहता
कोई शिकायत करे नहीं , शिकवा कोई नहीं करता

सावधान करता प्रतिपल, पाप पुण्य का भेद बता
जनम जनम का  साथी है  , जो तेरे दिल में छिपा हुआ

उसका कहना मान ले भाई, बहुत हो चुकी देरी है
दिन दिन में घर लौट जा अपने , आगे रात अँधेरी है

जो वादा करके तू आया, उसे निभाना ही होगा
इस दुनिया को छोड़ के अपने,देश को जाना ही होगा

ये, यौवन दिन, रात बुढापा, लौट समय फिर ना आता
एक बार जो पा ले "उसको", कभी नहीं फिर पछताता

जाग मुसाफिर सो ना जाना, माया के वश हो ना जाना
अपना "ज्ञान" बचा कर रखना, सकल कमाई खो ना जाना

बच कर रहना इस दुनिया से , दुनिया बड़ी लुटेरी है
इस दुनिया का नहीं भरोसा , ये माया कि चेरी है.
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34 टिप्पणियाँ:

sangeeta swarup ने कहा…

मानव को सही दिशा दिखाती सुन्दर रचना..बधाई

Udan Tashtari ने कहा…

हर शेर एक संदेश...बहुत खूब!

M VERMA ने कहा…

उसका कहना मान ले भाई, बहुत हो चुकी देरी है
दिन दिन में घर लौट जा अपने , आगे रात अँधेरी है
वाह क्या बात है
सुन्दर भाव

Udan Tashtari ने कहा…

उम्दा//बहुत बढ़िया!

संजय भास्कर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

वन्दना ने कहा…

गज़ब की प्रस्तुति…………………बहुत ही सुन्दर भाव्………शुक्रिया।

kunwarji's ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है जी!आपके सहयोग के लिए मै आपका आभारी हूँ!
मै आशा कर सकता हूँ के ये स्नेहाशीष सदैव मिलता रहेगा..
कुंवर जी,

kshama ने कहा…

Hameshaki tarah...bahut khoob..duniya mayajaal hai!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

जमीन से जुड़ी हुई इस रचना का हर एक शेर सत्य बोलता है!

देवेश प्रताप ने कहा…

बेहतरीन प्रस्तुति.........बहुत खूब

"अर्श" ने कहा…

ek khubsurat rachanaa padhane ko aaj mili... sandesh..



arsh

मिलिंद / Milind ने कहा…

चिंतनीय रचना.

manav vikash vigyan aur adytam ने कहा…

bahot hee achha savchintan sabase achha hai aur kisi tarah kee chinta nahi honee chaheye

JHAROKHA ने कहा…

ये दुनिया परदेस है इसमें ,रहने कि क्यूँ ठान रहा
सभी पराया है इस जग का, जिसको अपना मान रहा

ये सपनों कि नगरी इसमें ,भटक कहीं ना खो जाना
जाग, लौट चल, युगों- युगों को, परदेसी ना हो जाना
Ek bahut hee khoobsuratee se likhee gayee darshanik bhavon ko prastut karne valee rachna.

सुमन'मीत' ने कहा…

जीवन दर्शन करवाती हुई रचना

eindiawebguru ने कहा…

मनभावन

ब्लॉग पर गूगल बज़ बटन लगायें, सबसे दोस्ती बढ़ायें

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सच है सब कुछ पराया है पर .... फिर भी इंसान मेरे तेरे में फँसा है ...

ज्योति सिंह ने कहा…

इस दुनिया में अपना कोई, घर ना बने तो अच्छा हैजो फक्कड़ बन घूम रहा है , वो ही साधू सच्चा है
kitni sahi baate hai aapki ,bahut hi sundar rachna .

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

झूठ और मक्कारी के बल, लगी रूपये कि ढेरी है
अभी संभल जा बन्दे, माया, तेरी है ना मेरी है

बहुत खूब....!!

singhsdm ने कहा…

योगेश जी
मन जीत लिया आपने.......दो दो पंक्तियों में जीवन की सच्चाईँ बयां कर दी आपने......कबीर जी की तर्ज़ पर....! बहुत सटीक आत्म चिंतन.....!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

wah Swapn ji wah...

kshama ने कहा…

Ramnavmi ki anek shubhkamnayen!

BrijmohanShrivastava ने कहा…

सच्चा मीत जनम जनम का साथी ,विभिन्न रूप धारण करने पर भी तेरे साथ ही रहा उसको तो मार ही दिया है उसकी सुनो तो वह मनमानी नहीं करने देगा | झूंठ वेइमानी नहीं करने देगा |जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करती रचना

निर्झर'नीर ने कहा…

दिन दिन में घर लौट जा अपने , आगे रात अँधेरी है

जीवन दर्शन.........बहुत खूब....!!

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

Bahut hi sundar darshanik rachna hai...hindu jeevan darshan ka satva hai isme...

kumar zahid ने कहा…

इस दुनिया में अपना कोई घर ना बने तो अच्छा है
इस दुनिया को छोड़ के अपने,देश को जाना ही होगा



गंभीर चिन्तन परक रचना
शांत और निर्वेद
वीतरागी ही ऐसा लिख सकता है
बधाई

गिरीश पंकज ने कहा…

ek arase baad sundar-sarthak kavitaa dekh kar khushee hui.

psingh ने कहा…

उच्च विचार स्वप्न जी
बहुत ज्ञान पूर्ण व अध्यात्मिक रचना -आभार

सर्वत एम० ने कहा…

अंततः आ ही गया मैं. अंतराल शायद लम्बा है लेकिन स्मृतियों में आप सदा बने रहे.
इतनी शानदार सूफी रचना के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया.
मैं देर से आया फिर भी अपने नेचर से मजबूर हूँ. कहीं कहीं वर्तनी की त्रुटियाँ खटक रही हैं. थोडा ध्यान दें.
बहुत जल्द मिलते हैं, इस वादे के साथ विदा.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

झूठ और मक्कारी के बल, लगी रूपये कि ढेरी है
अभी संभल जा बन्दे, माया, तेरी है ना मेरी है

उसका कहना मान ले भाई, बहुत हो चुकी देरी है
दिन दिन में घर लौट जा अपने , आगे रात अँधेरी है

आपकी पंक्तियाँ भटकों को राह दिखने वाली हैं .....!!

बहुत खूब .....!!

आशीष/ ASHISH ने कहा…

Na kuchh tera, na kuchh mera!
Yeh dniya ek rain basera!
Phir kahe ko saari umariya,
Pap ki gathri dhoye?

Kuldeep Saini ने कहा…

bahut khoob bahut kuch sikhaati hai aapki ye rachna

बेचैन आत्मा ने कहा…

इस दुनिया में अपना कोई, घर ना बने तो अच्छा है
जो फक्कड़ बन घूम रहा है , वो ही साधू सच्चा है
ये दुनिया परदेस है इसमें ,रहने कि क्यूँ ठान रहा
सभी पराया है इस जग का, जिसको अपना मान रहा
--वाह क्या बात है
सत्य तो यही है यकबयक नहीं तो धीरे-धीरे इसे स्वीकार कर लेने में ही भलाई है।

विकास कुमार 'स्वप्न' ने कहा…

मैं आपके इस ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ और मुझे अपना आना वास्तव में सार्थक लगा, जैसे ही आपकी इस कृति को पढ़ा. सचमुच बहुत अच्चा लिखा है.

 

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