आसमान छूने को पंछी उड़ चला
और गगन की दूरियां कम हो गईं
विश्वास का बल है अभी परवाज़ में
है क्षितिज के पार तक उसकी नज़र
योगेश स्वप्न
शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008
सोमवार, 8 दिसंबर 2008
गिला.............
हमें बेशक भुला दें वो भुलायेंगे न उनको हम
गिला उनसे करें क्यूँ हम, यूँही आहें भरें क्यूँ हम
मुहोब्बत गर नहीं उनको तो फिर उल्फत करें क्यूँ हम
हुई नाकाम सब कोशिश , दिलों में भी नहीं रंजिश
नहीं मरता कोई हम पर, किसी पर फिर मरें क्यूँ हम
उन्हें चाहत जो मिलने की अगर होती तो मिल जाते
हमें दीदार हो उनका , कोई ख्वाहिश करें क्यूँ हम
जुदाई की उन्हें परवाह नहीं न गम बिछुड़ने का
तो फिर उनकी जुदाई में हम ही आँखें करें क्यूँ नम
अभी तक आस थी थोड़ी मगर वो आस भी तोडी
स्वप्न का खून कर डाला सितम आँखें हुईं बेदम
अगर वो सुन रहे हैं तो उन्हें कुछ कान में कह दूँ
हमें बेशक भुला दें वो भुलायेंगे न उनको हम
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