जैसे जैसे वंशी की, आवाज़ सुनते जा रहे हैं


जैसे जैसे वंशी की, आवाज़ सुनते जा रहे हैं
तेरी लीला के अनूठे, राज़ खुलते जा रहे हैं

तेरी लीला सामने, चलचित्र- सी दिखने लगी है
लेखनी भी कुछ अनोखी, दास्ताँ लिखने लगी है
तेरे गोप-ओ-गोपियों में, हम भी मिलते जा रहे हैं
जैसे जैसे वंशी की...........................................

एक तड़प है, एक कसक है, एक विरह की वेदना है
नयन कहते हैं प्रतिपल, अब तुम्हें ही देखना है
स्वप्न में देखा है तुमको, आँख मलते जा रहे हैं
जैसे जैसे वंशी की...........................................



तेरी राधा बनके नाचे, रास में होकर मगन
प्रीत की बढती गई, बढती गई, जैसे लगन
कृष्ण की भक्ति के रंग में हम भी रंगते जा रहे हैं 
जैसे जैसे वंशी की...........................................

 
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भूल चुके जो टोपी उसकी याद दिला दी 
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी



भूल चुके जो टोपी उसकी याद दिला दी 
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी 

 अन्न ना खाए अन्ना अनशन को तैयार
दूर हटाओ , दूर हटाओ, भ्रष्टाचार 
देश बचाओ , रोको , पैसे  की बर्बादी .
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी 


भूल चुके जो टोपी उसकी याद दिला दी 
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी 

कोटि कोटि भारत की जनता जाग गई है 
  नई युवा  पीढ़ी की ये आवाज़ नयी है
  देश द्रोहियों छोडो भारत, दो आजादी
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी 

भूल चुके जो टोपी उसकी याद दिला दी 
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी 

फिर खादी की ताकत , जनता जान गयी  है
 देशद्रोहियों को अब वो पहचान गई है
 अब ना बचेंगे लम्पट , सबको करो मुनादी
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी

भूल चुके जो टोपी उसकी याद दिला दी 
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी 

  ये मुट्ठी भर भ्रष्टाचारी टिक ना सकेंगे
 घुटने टेकेंगे , आगे, अन्ना के , झुकेंगे 
 अन्ना के संग देश की है पूरी  आबादी
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी

भूल चुके जो टोपी उसकी याद दिला दी 
आज हमारे बीच आ गया दूजा गाँधी 

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सहज मिलेंगे श्याम प्यार करके तो देखो

सहज मिलेंगे श्याम प्यार करके तो देखो

सहज मिलेंगे श्याम प्यार करके तो देखो
उसकी खातिर कभी आँख भर के तो देखो

सिर्फ प्यार का भूखा है  मेरा ठाकुर
मेरी बात पर ऐतबार करके तो देखो

आएगा , आता है," वो" सबका प्रेमी
मन -मंदिर अपना बुहार करके तो देखो

न्यौछावर कर दो, उस पर, सब कुछ अपना
सोचो मत बस एक बार करके तो देखो

छिपा हुआ है वही तुम्हारे तन मन में
नयन मूँद उसको निहार करके तो देखो

कभी तो रोओ तड़पो उसको पाने को
मेरी बातों पर विचार करके तो देखो

"स्वप्न" मिल गई है बहार, उसको पाकर
जीवन अपना भी, बहार करके तो देखो  

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ढाई अक्षर प्यार का, ना कर सका कुछ


ढाई अक्षर प्यार का, ना, कर सका कुछ 


झूठ को सच, और सच को, झूठ करती आई दुनिया
बेशर्म, करते  हुए, ये सब,नहीं  शरमाई दुनिया

बेगुनाहों को, सजा मिलती रही,क्यूँ
कर सकी ना, आज तक भरपाई दुनिया

दीन दुखियों की सदा पर, ऊंघती,
और  पैसे की सदा पर,जाग कर उठ धाई दुनिया

ढाई अक्षर प्यार का, ना कर सका कुछ 
"स्वप्न " उसने पा के भी,ना ,पाई दुनिया

"स्वप्न" सच्चा जो,खुदा के सामने
उसने हो बेख़ौफ़, ये  ठुकराई दुनिया

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बेकरारों कि तरह अबकी दफा लगते हैं

बेकरारों कि तरह  अबकी दफा लगते हैं

हमको हर बार वो क्यूँ तस्वीर-ए-वफ़ा लगते हैं
हम तो सजदे में हैं वो हमसे खफा लगते हैं

जाने क्यूँ चाहे ये मन उनके लिए लुट जाना
सौदा घाटे का सही हमको नफा लगते हैं

कितनी शिद्दत से छिपाते हैं मेरा राज़ वो फिर
कैसे कह दूँ के हमें  बेवफा लगते हैं

कैसे कह दूँ कि उन्हें प्यार नहीं है हमसे
बेकरारों कि तरह अबकी दफा लगते हैं
             
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मुझे ले चलो

मुझे ले चलो

मुझे ले चलो राधा के पास
मेरा कहीं लागे ना जिया
बिन राधा के मैं हूँ उदास
मेरा कहीं लागे ना जिया

राधा से बिछुड़े बीते हैं साल कईईई.....
पल पल होती जाती उसकी याद नई
याद आता  है मधुबन का रास
मेरा कहीं...............................

राधा से कुछ मन की बातें करनी है
पनघट पर राधा कि गागर भरनी है
राधा राधा बोले हर साँस
मेरा कहीं..................................

रूठी राधा को मैं आज मनाऊंगा
गले लगा कर उसको धीर बंधाऊंगा
उससे प्रीत करूँगा कुछ खास
मेरा कहीं..........................



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भजन 

कभी बनाया साकी मुझको , कभी पिलाया जाम

कभी नचाया बना के राधा , कभी बना के श्याम
कभी बनाया साकी मुझको , कभी पिलाया जाम
बड़ा अनूठा रास रचाया , मनमोहन घनश्याम
तूने मनमोहन घनश्याम

कलियुग में भी तेरी मुरलिया बाज रही चहुँ ओर
जिसे पुकारे वो ही जाने श्याम छिपे किस ठौर
और राधिका दौड़ रही है छोड़ के सारे काम

बड़ा अनूठा रास रचाया , मनमोहन घनश्याम
तूने मनमोहन घनश्याम

गीत भी है संगीत भी है, सबके मन में प्रीत भी है
राधा सी मतवाली भी है, मोहन सा मनमीत भी है
रास-नृत्य-रस भिगो रहा है मन-वृन्दावन-धाम

बड़ा अनूठा रास रचाया , मनमोहन घनश्याम
तूने मनमोहन घनश्याम

सत्य हो गए स्वप्न वो सारे , जो देखे थे गोपी ने
मन मंदिर में श्याम पधारे, प्रेम-सुधा-रस को पीने
बड़े भाग्य रे आज "स्वप्न" के श्याम मिले बे-दाम

बड़ा अनूठा रास रचाया , मनमोहन घनश्याम
तूने मनमोहन घनश्याम

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अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे

अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे

अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे
जग की ज्वाला में जला मन, ढूंढे तेरी छाँव रे
अब तो बस............................................

एक तेरी प्यास तेरी आस, हर एक श्वास में
तुझको पा जाऊं तड़पता मन ,इसी विश्वास में
रिश्ते  नाते तोड़ रख दी, जिंदगी भी दांव रे
अब तो बस..............................................

न राधा हूँ न मीरा हूँ , न तुलसी न संत कबीर
तेरा नाम ले भटक रहा हूँ, बना बावरा एक फकीर
अब तो बता दे है कहाँ, तेरा देश, तेरा गाँव  रे
अब तो बस............................................

जग का बंधन ना रहा, ना  देह का बंधन
सुख दुःख भूला, हर्ष शोक, भूला सब क्रंदन
बस प्रतीक्षा रत पडूंगा , कब तुम्हारे पाँव रे
अब तो बस.......................................
योगेश स्वप्न

आ भी जाओ


आ भी जाओ (भजन)

जब तड़प उठ ही गई है, तुमको पाने कि ह्रदय में
दूर तुम रह ना सकोगे , श्याम मेरे आ भी जाओ

हम तुम्हारे हो चुके  , क्यूँ तुम मेरे होते नहीं
गैर तुम कह ना सकोगे , श्याम मेरे आ भी जाओ

ये मिलन कि चाह मेरी , ये विरह कि पीर मेरी
और तुम सह ना सकोगे, श्याम मेरे आ भी जाओ

बिन तुम्हारे रह रहे हैं  , बन के आंसू बह रहे हैं 
तुम मगर बह ना सकोगे, श्याम मेरे आ भी जाओ.

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इस दुनिया में अपना कोई घर ना बने तो अच्छा है

इस दुनिया में अपना कोई घर ना बने तो अच्छा है
( आत्म - चिंतन)

इस दुनिया में अपना कोई, घर ना बने तो अच्छा है
जो फक्कड़ बन घूम रहा है , वो ही साधू सच्चा है

ये दुनिया परदेस है इसमें ,रहने कि क्यूँ ठान रहा
सभी पराया है इस जग का, जिसको अपना मान रहा

ये सपनों कि नगरी इसमें ,भटक कहीं ना खो  जाना
जाग, लौट  चल, युगों- युगों को, परदेसी ना हो जाना

झूठ और मक्कारी के बल, लगी रूपये कि ढेरी है
अभी संभल जा बन्दे, माया, तेरी है ना मेरी है

तेरे साथ आया है तेरा मीत , उसे क्यूँ भुला दिया
अपने भीतर झाँक जगा ले, तूने उसको सुला दिया

वो सच्चा है मीत तेरा जो,, हर पल साथ तेरे रहता
कोई शिकायत करे नहीं , शिकवा कोई नहीं करता

सावधान करता प्रतिपल, पाप पुण्य का भेद बता
जनम जनम का  साथी है  , जो तेरे दिल में छिपा हुआ

उसका कहना मान ले भाई, बहुत हो चुकी देरी है
दिन दिन में घर लौट जा अपने , आगे रात अँधेरी है

जो वादा करके तू आया, उसे निभाना ही होगा
इस दुनिया को छोड़ के अपने,देश को जाना ही होगा

ये, यौवन दिन, रात बुढापा, लौट समय फिर ना आता
एक बार जो पा ले "उसको", कभी नहीं फिर पछताता

जाग मुसाफिर सो ना जाना, माया के वश हो ना जाना
अपना "ज्ञान" बचा कर रखना, सकल कमाई खो ना जाना

बच कर रहना इस दुनिया से , दुनिया बड़ी लुटेरी है
इस दुनिया का नहीं भरोसा , ये माया कि चेरी है.
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