उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

मैं कभी तुझसे ग़र दूर हूँ तो समझ लीजे

मैं कभी तुझसे ग़र दूर हूँ
तो समझ लीजे मज़बूर हूँ
हूँ परेशां किसी बात से
या किसी ग़म में मशगूल हूँ

तेरी यादों में खोया हूँ या
तेरे वादों पे भूला जहाँ
देखता हूँ तेरे ख्वाब मैं
दूर तुझसे खिला फूल हूँ

या ख़ुशी में हूँ खोया हुआ
नींद में हूँ या सोया हुआ
इश्क़ में तेरे बदनाम हूँ
प्यार में तेरे मशहूर हूँ

बात कोई भी हो जान-ए-मन
ना समझना मुझे बेवफा
तुमको भूला हूँ ना सोचना
ना समझना के मग़रूर हूँ
(योगेश वर्मा स्वप्न 11:10:2016)

शनिवार, 22 नवंबर 2014

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बुधवार, 13 जुलाई 2011

सहज मिलेंगे श्याम प्यार करके तो देखो

सहज मिलेंगे श्याम प्यार करके तो देखो

सहज मिलेंगे श्याम प्यार करके तो देखो
उसकी खातिर कभी आँख भर के तो देखो

सिर्फ प्यार का भूखा है  मेरा ठाकुर
मेरी बात पर ऐतबार करके तो देखो

आएगा , आता है," वो" सबका प्रेमी
मन -मंदिर अपना बुहार करके तो देखो

न्यौछावर कर दो, उस पर, सब कुछ अपना
सोचो मत बस एक बार करके तो देखो

छिपा हुआ है वही तुम्हारे तन मन में
नयन मूँद उसको निहार करके तो देखो

कभी तो रोओ तड़पो उसको पाने को
मेरी बातों पर विचार करके तो देखो

"स्वप्न" मिल गई है बहार, उसको पाकर
जीवन अपना भी, बहार करके तो देखो  

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मंगलवार, 16 नवंबर 2010

ढाई अक्षर प्यार का, ना कर सका कुछ


ढाई अक्षर प्यार का, ना, कर सका कुछ 


झूठ को सच, और सच को, झूठ करती आई दुनिया
बेशर्म, करते  हुए, ये सब,नहीं  शरमाई दुनिया

बेगुनाहों को, सजा मिलती रही,क्यूँ
कर सकी ना, आज तक भरपाई दुनिया

दीन दुखियों की सदा पर, ऊंघती,
और  पैसे की सदा पर,जाग कर उठ धाई दुनिया

ढाई अक्षर प्यार का, ना कर सका कुछ 
"स्वप्न " उसने पा के भी,ना ,पाई दुनिया

"स्वप्न" सच्चा जो,खुदा के सामने
उसने हो बेख़ौफ़, ये  ठुकराई दुनिया

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गुरुवार, 11 नवंबर 2010

बेकरारों कि तरह अबकी दफा लगते हैं

बेकरारों कि तरह  अबकी दफा लगते हैं

हमको हर बार वो क्यूँ तस्वीर-ए-वफ़ा लगते हैं
हम तो सजदे में हैं वो हमसे खफा लगते हैं

जाने क्यूँ चाहे ये मन उनके लिए लुट जाना
सौदा घाटे का सही हमको नफा लगते हैं

कितनी शिद्दत से छिपाते हैं मेरा राज़ वो फिर
कैसे कह दूँ के हमें  बेवफा लगते हैं

कैसे कह दूँ कि उन्हें प्यार नहीं है हमसे
बेकरारों कि तरह अबकी दफा लगते हैं
             
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रविवार, 11 जुलाई 2010

मुझे ले चलो

मुझे ले चलो

मुझे ले चलो राधा के पास
मेरा कहीं लागे ना जिया
बिन राधा के मैं हूँ उदास
मेरा कहीं लागे ना जिया

राधा से बिछुड़े बीते हैं साल कईईई.....
पल पल होती जाती उसकी याद नई
याद आता  है मधुबन का रास
मेरा कहीं...............................

राधा से कुछ मन की बातें करनी है
पनघट पर राधा कि गागर भरनी है
राधा राधा बोले हर साँस
मेरा कहीं..................................

रूठी राधा को मैं आज मनाऊंगा
गले लगा कर उसको धीर बंधाऊंगा
उससे प्रीत करूँगा कुछ खास
मेरा कहीं..........................



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भजन 

बुधवार, 16 जून 2010

अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे

अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे

अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे
जग की ज्वाला में जला मन, ढूंढे तेरी छाँव रे
अब तो बस............................................

एक तेरी प्यास तेरी आस, हर एक श्वास में
तुझको पा जाऊं तड़पता मन ,इसी विश्वास में
रिश्ते  नाते तोड़ रख दी, जिंदगी भी दांव रे
अब तो बस..............................................

न राधा हूँ न मीरा हूँ , न तुलसी न संत कबीर
तेरा नाम ले भटक रहा हूँ, बना बावरा एक फकीर
अब तो बता दे है कहाँ, तेरा देश, तेरा गाँव  रे
अब तो बस............................................

जग का बंधन ना रहा, ना  देह का बंधन
सुख दुःख भूला, हर्ष शोक, भूला सब क्रंदन
बस प्रतीक्षा रत पडूंगा , कब तुम्हारे पाँव रे
अब तो बस.......................................
योगेश स्वप्न

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

आ भी जाओ


आ भी जाओ (भजन)

जब तड़प उठ ही गई है, तुमको पाने कि ह्रदय में
दूर तुम रह ना सकोगे , श्याम मेरे आ भी जाओ

हम तुम्हारे हो चुके  , क्यूँ तुम मेरे होते नहीं
गैर तुम कह ना सकोगे , श्याम मेरे आ भी जाओ

ये मिलन कि चाह मेरी , ये विरह कि पीर मेरी
और तुम सह ना सकोगे, श्याम मेरे आ भी जाओ

बिन तुम्हारे रह रहे हैं  , बन के आंसू बह रहे हैं 
तुम मगर बह ना सकोगे, श्याम मेरे आ भी जाओ.

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सोमवार, 15 मार्च 2010

बस यही मुश्किल है



प्रस्तुत है एक और पुरानी लिखी रचना.
 

बस यही मुश्किल है 

तोड़ दूं कसमें तमाम, और वादे भूल जाऊं
बस यही मुश्किल है मेरी , कैसे मैं उसको भुलाऊं
मुझसे ज्यादा कीमती हैं अश्क मेरे यार के
है अभी नादान मेरा यार क्यूँ उसको रुलाऊं

कोई सब कुछ जानते भी जब बने अनजान सा
है यही मुश्किल कि उस्ससे  क्या छिपाऊं क्या बताऊँ

कोई फब्ती ही नहीं तस्वीर  दिल के फ्रेम में
है यही मुश्किल कि उसको छोड़ कर किसको सजाऊं

याद ही  कोई नहीं है नाम एक उसके सिवा
है यही मुश्किल कि उसको छोड़ कर किसको बुलाऊं



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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

हम तो ऐसे ही कहेंगे जी "गज्जल"

हम तो ऐसे ही कहेंगे  जी "गज्जल"
(होली के अवसर पर विशेष )



देर से बैठा हूँ इस उम्मीद में
मैं सुनाऊं और तू इरशाद कर



एक दो ही बस लिखो अच्छी लिखो
ना कविता कि घणी औलाद कर

टेढ़ी मेढ़ी लिख के उसको सौंप दे
ना लिखी जाये तो एक उस्ताद कर

कोई गर सुनता नहीं तेरी गज्ज़ल
मस्त होकर लिख ना यूँ अवसाद कर

ब्लॉग है ये, इसमें सब कुछ चल रहा
हँस के सह, ना कोई  " माओवाद" कर


हम तो ऐसे ही कहेंगे  जी "गज्जल"
तू टमाटर फ़ेंक  चाहे दाद कर

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याद कोई दिल में फिर ईजाद का
फिर से वो गुज़रा ज़माना याद कर

ये शहर है मत बहा आँखों से नीर
रख संजो कर जल ना यूँ बर्बाद कर

क्यूँ लुटे गुलशन पे हैरां हो रहा
चल कोई गुलशन नया आबाद कर

क्यूँ फंसा बैठा है मक्कड़जाल में
खुद को इस जंजाल से आज़ाद कर

छोड़ना पड़ जायेगा हर घोंसला
अब  बसर "यू,पी" में या "दिलशाद" कर

हम तो जैसे हैं भले हैं अब "स्वप्न"
तू ख़ुशी  से खुद को इक "नौशाद" कर

गर भला करना है कर नज़रें झुका
पर, जताकर , ना कोई इमदाद कर

जीते जी तरसा दिया एक कौर को
बाद मरने के ना उनका श्राद्ध कर

आपने पढ़ ली मेरी सारी "गज्ज़ल"
चलिए अब चलता हूँ "धन्यवाद" कर

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