उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

अजनबी सा.............................

अजनबी सा लग रहा है ये शहर
जैसे इससे वास्ता कोई न था

घूम फिर कर फिर वहीँ पर आ गए
कोई मंजिल रास्ता कोई न था

क्यूँ किसी से प्यार की उम्मीद की
बस उधारी थी जमा कोई न था

कर दिया खाली किराये का मकान
लामकां थे हम मकान कोई न था

छोड़ कर duniya ,akele चल दिए
hamsafar या kaarvan कोई न था

स्वप्न की कोई haqiqat थी कहाँ
बस tasavvur था निशान कोई न था

योगेश स्वप्न

गुरुवार, 25 दिसंबर 2008

१. कोई ख्वाहिश .........2.ना ख्वाहिश.........(ग़ज़ल युग्म )

१।

कोई ख्वाहिश, कोई उम्मीद, कुछ अरमान बाकी है
रहेगा कुछ न कुछ बाक़ी, ये जब तक जान बाक़ी है
कोई ख्वाहिश.....................................................

हजारों मिल चुके ,बिछुडे हजारों, मुझ से मिल मिल कर
हजारों की मगर मुझ से अभी, पहचान बाकी है
कोई ख्वाहिश....................................................

कोई नगमा नया फूटेगा , दिल की वादियों में से
कोई तो ख्वाब सच होकर , हमारे सामने होगा
की सूने घर में आना,एक नया मेहमान बाक़ी है
कोई ख्वाहिश .................................................

सदा उसको कहाँ से दूँ , पुकारूँ मैं उसे कैसे
नज़र के सामने मेरे, कभी एक बार वो आए
मैं उसको जानता हूँ ,मुझसे जो अनजान बाकी है
कोई ख्वाहिश................................................
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२. ना ख्वाहिश..........................................

ना ख्वाहिश ना कोई उम्मीद, न अरमान बाकी है
सभी कुछ लुट चुका अपना, फ़क़त अब जान बाकी है
ना................................................................

ना मिलने की तमन्ना है , मिले क्यूँ कोई आ मुझसे
बचा है क्या हमारे पास ,क्यूँ पहचान बाकी है
ना ख्वाहिश..................................................

कोई तारा नया किस्मत का टूटेगा ये ज़ाहिर है
नया एक ख्वाब ,चकनाचूर होकर ,खाक में होगा
मुहोब्बत के लिए , कोई नया बलिदान बाकी है
ना ख्वाहिश....................................................

किसको सदा दूँ ,कौन आएगा ,कहाँ से अब
मेरे टूटे हुए दिल को, यहाँ पर कौन जोडेगा
धड़कते दिल का हो जाना, अभी बेजान बाकी है
ना ख्वाहिश..................................................

उपरोक्त दोनों रचनाएँ १९८१-८२ में लिखी गईं, पहली रचना १९८२ में आल इंडिया रेडियो से संगीत बद्ध होकर प्रसारित हुई, तथा मेरी प्रथम प्रकाशित पुस्तक "तुम्हारे लिए " से ली गईं हैं। ---- योगेश स्वप्न



बुधवार, 24 दिसंबर 2008

यूँ तो हर रोज़ शाम आती है

यूँ तो हर रोज़ शाम आती है
मेरी तन्हाई कब मिटती है

मैं तो पीता हूँ कुछ शराब मगर
याद उनकी तो मुझको खाती है

उनसे मिलना तो अब हुआ मुश्किल
आखिरी आस एक पाती है

यूँ तो हैं फोन भी मोबाइल भी
नम्बरों की कमी सताती है

हमने सोचा था वो सदा देगी
पर क्या गूंगी कभी बुलाती है

इश्क की आग भी अजब शै है
जब बुझाओ भड़कती जाती है

अब तो बस देखना यही है स्वप्न
कैसे किस्मत हमें मिलाती है

योगेश swapn

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

तुम्हारा जन्म दिन

मुझे सबसे प्यारा तुम्हारा जन्म दिन
मेरी जिंदगी का सहारा जन्म दिन, तुम्हारा जन्म दिन...................

बड़ी इंतजारी करा के जो आता
मैं साल भर जिसके सपने सजाता
हर बार रब से दुआ ये ही करता
हर बार आए दुबारा जन्म दिन
तुम्हारा जन्म दिन...........................................

कभी कार्ड भेजा कभी फूल भेजा
कभी दिल की बातों को दिल में सहेजा
कभी हंस के रो के कभी तिल मिला के
कभी कैसे कैसे गुज़ारा जन्म दिन
तुम्हारा......................................................

कभी फ़ोन में तुमको शुभ कामना दी
कभी गीत में भरके शुभ भावना दी
मगर ये शिकायत रही मौन तेरा
नहीं तोड़ पाया तुम्हारा जन्म दिन
तुम्हारा.................................................

पच्चीस पचत्तर या सौ हों या ज्यादा
तुम्हारा जन्म दिन मानाने का vada
है पक्का इरादा नहीं कोई बाधा
ari मेरी "राधा" तुम्हारा जन्म दिन
तुम्हारा जन्म...................योगेश swapn