उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

ढाई अक्षर प्यार का, ना कर सका कुछ


ढाई अक्षर प्यार का, ना, कर सका कुछ 


झूठ को सच, और सच को, झूठ करती आई दुनिया
बेशर्म, करते  हुए, ये सब,नहीं  शरमाई दुनिया

बेगुनाहों को, सजा मिलती रही,क्यूँ
कर सकी ना, आज तक भरपाई दुनिया

दीन दुखियों की सदा पर, ऊंघती,
और  पैसे की सदा पर,जाग कर उठ धाई दुनिया

ढाई अक्षर प्यार का, ना कर सका कुछ 
"स्वप्न " उसने पा के भी,ना ,पाई दुनिया

"स्वप्न" सच्चा जो,खुदा के सामने
उसने हो बेख़ौफ़, ये  ठुकराई दुनिया

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गुरुवार, 11 नवंबर 2010

बेकरारों कि तरह अबकी दफा लगते हैं

बेकरारों कि तरह  अबकी दफा लगते हैं

हमको हर बार वो क्यूँ तस्वीर-ए-वफ़ा लगते हैं
हम तो सजदे में हैं वो हमसे खफा लगते हैं

जाने क्यूँ चाहे ये मन उनके लिए लुट जाना
सौदा घाटे का सही हमको नफा लगते हैं

कितनी शिद्दत से छिपाते हैं मेरा राज़ वो फिर
कैसे कह दूँ के हमें  बेवफा लगते हैं

कैसे कह दूँ कि उन्हें प्यार नहीं है हमसे
बेकरारों कि तरह अबकी दफा लगते हैं
             
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रविवार, 11 जुलाई 2010

मुझे ले चलो

मुझे ले चलो

मुझे ले चलो राधा के पास
मेरा कहीं लागे ना जिया
बिन राधा के मैं हूँ उदास
मेरा कहीं लागे ना जिया

राधा से बिछुड़े बीते हैं साल कईईई.....
पल पल होती जाती उसकी याद नई
याद आता  है मधुबन का रास
मेरा कहीं...............................

राधा से कुछ मन की बातें करनी है
पनघट पर राधा कि गागर भरनी है
राधा राधा बोले हर साँस
मेरा कहीं..................................

रूठी राधा को मैं आज मनाऊंगा
गले लगा कर उसको धीर बंधाऊंगा
उससे प्रीत करूँगा कुछ खास
मेरा कहीं..........................



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भजन 

बुधवार, 16 जून 2010

अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे

अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे

अब तो बस दे दे दरस, ओ सांवरे
जग की ज्वाला में जला मन, ढूंढे तेरी छाँव रे
अब तो बस............................................

एक तेरी प्यास तेरी आस, हर एक श्वास में
तुझको पा जाऊं तड़पता मन ,इसी विश्वास में
रिश्ते  नाते तोड़ रख दी, जिंदगी भी दांव रे
अब तो बस..............................................

न राधा हूँ न मीरा हूँ , न तुलसी न संत कबीर
तेरा नाम ले भटक रहा हूँ, बना बावरा एक फकीर
अब तो बता दे है कहाँ, तेरा देश, तेरा गाँव  रे
अब तो बस............................................

जग का बंधन ना रहा, ना  देह का बंधन
सुख दुःख भूला, हर्ष शोक, भूला सब क्रंदन
बस प्रतीक्षा रत पडूंगा , कब तुम्हारे पाँव रे
अब तो बस.......................................
योगेश स्वप्न

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

आ भी जाओ


आ भी जाओ (भजन)

जब तड़प उठ ही गई है, तुमको पाने कि ह्रदय में
दूर तुम रह ना सकोगे , श्याम मेरे आ भी जाओ

हम तुम्हारे हो चुके  , क्यूँ तुम मेरे होते नहीं
गैर तुम कह ना सकोगे , श्याम मेरे आ भी जाओ

ये मिलन कि चाह मेरी , ये विरह कि पीर मेरी
और तुम सह ना सकोगे, श्याम मेरे आ भी जाओ

बिन तुम्हारे रह रहे हैं  , बन के आंसू बह रहे हैं 
तुम मगर बह ना सकोगे, श्याम मेरे आ भी जाओ.

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सोमवार, 15 मार्च 2010

बस यही मुश्किल है



प्रस्तुत है एक और पुरानी लिखी रचना.
 

बस यही मुश्किल है 

तोड़ दूं कसमें तमाम, और वादे भूल जाऊं
बस यही मुश्किल है मेरी , कैसे मैं उसको भुलाऊं
मुझसे ज्यादा कीमती हैं अश्क मेरे यार के
है अभी नादान मेरा यार क्यूँ उसको रुलाऊं

कोई सब कुछ जानते भी जब बने अनजान सा
है यही मुश्किल कि उस्ससे  क्या छिपाऊं क्या बताऊँ

कोई फब्ती ही नहीं तस्वीर  दिल के फ्रेम में
है यही मुश्किल कि उसको छोड़ कर किसको सजाऊं

याद ही  कोई नहीं है नाम एक उसके सिवा
है यही मुश्किल कि उसको छोड़ कर किसको बुलाऊं



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शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

हम तो ऐसे ही कहेंगे जी "गज्जल"

हम तो ऐसे ही कहेंगे  जी "गज्जल"
(होली के अवसर पर विशेष )



देर से बैठा हूँ इस उम्मीद में
मैं सुनाऊं और तू इरशाद कर



एक दो ही बस लिखो अच्छी लिखो
ना कविता कि घणी औलाद कर

टेढ़ी मेढ़ी लिख के उसको सौंप दे
ना लिखी जाये तो एक उस्ताद कर

कोई गर सुनता नहीं तेरी गज्ज़ल
मस्त होकर लिख ना यूँ अवसाद कर

ब्लॉग है ये, इसमें सब कुछ चल रहा
हँस के सह, ना कोई  " माओवाद" कर


हम तो ऐसे ही कहेंगे  जी "गज्जल"
तू टमाटर फ़ेंक  चाहे दाद कर

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याद कोई दिल में फिर ईजाद का
फिर से वो गुज़रा ज़माना याद कर

ये शहर है मत बहा आँखों से नीर
रख संजो कर जल ना यूँ बर्बाद कर

क्यूँ लुटे गुलशन पे हैरां हो रहा
चल कोई गुलशन नया आबाद कर

क्यूँ फंसा बैठा है मक्कड़जाल में
खुद को इस जंजाल से आज़ाद कर

छोड़ना पड़ जायेगा हर घोंसला
अब  बसर "यू,पी" में या "दिलशाद" कर

हम तो जैसे हैं भले हैं अब "स्वप्न"
तू ख़ुशी  से खुद को इक "नौशाद" कर

गर भला करना है कर नज़रें झुका
पर, जताकर , ना कोई इमदाद कर

जीते जी तरसा दिया एक कौर को
बाद मरने के ना उनका श्राद्ध कर

आपने पढ़ ली मेरी सारी "गज्ज़ल"
चलिए अब चलता हूँ "धन्यवाद" कर

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शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

प्रीत की पहली निशानी याद है


चलिए आज  VALENTINE DAY  पर कुछ पुरानी यादें ताज़ा करते हुए निम्न दो रचनाएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ . हालाँकि  VALENTINE DAY  का  चलन कुछ ही वर्ष पूर्व शुरू हुआ है, तो समय की धारा के साथ बहते हुए  क्यूँ न इसका आनंद लें.


प्रीत की पहली निशानी याद है



प्रीत की पहली निशानी याद है
प्यार से कहना "ओ जानी" याद है

खूबसूरत हुस्न में बाँकी अदा
और मचलती वो जवानी याद है

इश्क में डूबी ,पिघलती इक शमा
शोख औ नटखट दिवानी याद है

वो मिलन की बेकरारी, वो कशिश
वो तड़प दिल की रूहानी याद है

बात करते और लखते चाँद को
रात जो बीती सुहानी याद है

दिल्लगी ही दिल्लगी में दिल गया
दिल की "दिल्ली" राजधानी याद है

देखकर उसको जुदाई  के  समय
आँख से झरता  वो पानी याद है

"स्वप्न" कैसे भूल सकता है उन्हें
दिल को जो बातें पुरानी याद हैं.



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क्या कहें ?


क्या कहें कुछ आज, कहने को नहीं है
कुछ गिला या कोई, शिकवा भी नहीं है
कौन तोड़े ,मौन, पहले, थी प्रतीक्षा
जिसके चलते हम कहीं , अब वो कहीं है

जिंदगी भर प्यार से ,जिसको पुकारा
दे दुआएं दिल ने, जिस दिल को दुलारा
वो जहाँ था , आज तक भी तो वहीँ है
क्या कहें कुछ आज..........................

दिल तो कहता ,वो नहीं भूलेंगे हमको
अब भी लगता है, वो आ छू लेंगे हमको
पर नहीं आयेंगे वो, ये ही सही है
क्या कहें कुछ  आज.......................

कितना, किसको प्यार करता है कोई, क्यूँ?
कितना दिल को वार करता है कोई क्यूँ?
इसका  उत्तर दे,   बही, ऐसी कहीं  है?
क्या कहें कुछ  आज.......................

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सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

खुल गई है फिर पुरानी डायरी

खुल गई है फिर पुरानी डायरी



खुल गई है फिर, पुरानी डायरी
आ गई फिर याद, भूली शायरी

हो गए पीले सभी, पन्ने मगर
गंध अब तक भी, सुहानी आए री

फूल सूखे कह रहे, रोते हुए
याद ना दिल से पुरानी, जाए री

क्या कहें मुश्किल, हमें उसके सिवा
आज तक दूजा ,कोई ना भाए री

आज भी सुनकर, कहीं एक नाम वो
मन तुरत दिल से ,निकल कर धाए री

जो बनाया था कभी, उसके लिए
दिल वही भूला, तराना, गाए  री

आँख से जैसे, समंदर बह चला
तन तड़प कर, कह रहा है"हाय"री

"स्वप्न" शायद वो भी, तडपेगा यूँही
वो कहीं भी जाए, बेशक जाए री

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शनिवार, 23 जनवरी 2010

छिपा हुआ जो एक गुण , सिर्फ उसी को देख

छिपा हुआ जो एक गुण , सिर्फ उसी को देख
 
झूठे धोखेबाज़ को, लानत औ धिक्कार
लेनदार होवें खड़े,आकर जिसके द्वार

कसमें खा , फिर जाए जो, कितना है वो नीच
करिए चौराहे उसे, नंगा सबके बीच

जो दाता के नाम पर, धोखा देता जाए
निश्चय ही खा जायेगी ,उसको सबकी हाय

सबका पैसा ऐंठ कर, ठाठ करे जो खूब
एक दिन ऐसा आएगा, घास पाए ना दूब

बार बार खाता कसम , नहीं करेगा पाप
सत्यनारायण कथा-सम,उसे मिलेगा शाप

लेना  लेना आ गया , देना भी तो सीख
दिया नहीं, परलोक में, तुझे मिले ना भीख

कीमत हर इंसान की ,पैसे से ना तोल
धर्म और ईमान ही, दुनिया में अनमोल

कमियाँ हर इंसान में , होती सदा  अनेक
छिपा हुआ जो एक गुण , सिर्फ उसी को देख

घुमा फिरा कर बात सब ,धर्म कह रहे एक
छोड़ कपट छल छिद्र को , बन्दे बन जा नेक

शीशा होता साफ़ जब, तभी दिखे तस्वीर
मन का शीशा साफ़ कर , मन में ही " रघुबीर"

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शनिवार, 9 जनवरी 2010

तेरी याद मेरे साथ है तन्हा नहीं हूँ मैं

लीजिये एक और रचना पुरानी डायरी से

तेरी याद मेरे साथ है तन्हा नहीं हूँ मैं 

तेरी याद मेरे साथ है, तन्हा नहीं हूँ मैं
तारों से भरी रात है ,वीरां नहीं हूँ मैं

पूछूंगा हाल जब कभी, आओगे सामने
ख़्वाबों में मुलाक़ात है, गूंगा नहीं हूँ मैं

हाँ जानता हूँ दर्द,ये आंसू, दीवानगी
सब प्यार की सौगात है, नादाँ नहीं हूँ मैं

क्यों दे रहे हो प्यार से, सपनों की टाफियां
ऐसे ही बहल जाऊँगा ,बच्चा नहीं हूँ मैं

दर्द से पैदा हुआ, लफ़्ज़ों के बल चला
क्या सोचते हो , देख, लो नगमा नहीं हूँ मैं

जागोगे नींद से  कभी,ढूंढोगे फिर मुझे
हूँ "स्वप्न" में खोया , मगर सपना नहीं हूँ मैं


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मंगलवार, 5 जनवरी 2010

ना भुला सका

लीजिये एक और रचना पुरानी डायरी से.


ना भुला सका 

मैंने तेरी राह ना देखी,
इंतज़ार भी नहीं किया
सच कहता हूँ ,दिल से, मैंने
तुझको प्यार भी नहीं किया
फिर भी जाने क्या कारण है तुझको मैं ना भुला सका

तुझसे कभी ना मिलना चाह
तेरा रूप ना कभी सराहा
वफ़ा की कोई कसम ना खाई
वादा कोई नहीं किया
फिर भी जाने क्या कारण है तुझको मैं ना भुला सका

तेरे लिए कोई गीत ना गाया
कोई फ़साना नहीं बनाया
दीवाना ना बनकर भटका
तुझको रुसवा नहीं किया
फिर भी जाने क्या कारण है तुझको मैं ना भुला सका

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