भोली सूरत वाले चेहरे छुपे हुए रुस्तम निकले
चिंगारी जिनको समझे हम वो तो पूरे बम निकले
ग़ज़ल कहो या शायरी या कविता या हंसगुल्ले
प्रेम सुधा के पीने वाले वो मेरे हमदम निकले
जब तक तार न छेड़े थे सागर में खामोशी थी
एक एक तार को छेड़ा तो लहरों के सरगम निकले
कोरा कागज़ लगती थी जो किताब पहले पहले
खोल के उसको देखा तो भरे हुए कालम निकले
आए भी वो गए भी वो इन थोड़े से लम्हों में
नयन विदा करने वालों के देखा तो पुरनम निकले
योगेश स्वप्न
गुरुवार, 16 अप्रैल 2009
सोमवार, 13 अप्रैल 2009
"भावी" और "गीत दूत"
आज हमारे वैवाहिक जीवन के पच्चीस सुखद वर्ष पूरे हुए.यानि सिल्वर जुबली हो गई। विवाह से पहले की कुछ यादें ताज़ा हो गईं ।आज की रचना "भावी" ०६.०४.१९७५ को लिखी एक कविता , जब मैं कॉलेज में पढता था , अविवाहित था , प्रस्तुत कर रहा हूँ साथ ही एक नज़म भी हैं "गीत दूत" शीर्षक से ,ये भी १९७५-८० के मध्य की है.१९-२० वर्षीया युवा कवि की तात्कालीन भावनाएं. आशा करता हूँ आपको पसंद आएँगी.
"भावी"
ओ स्वप्न लोक की परी
तुम्हारी छवि
मेरे ह्रदय दर्पण में
ओ भावी हृदयेश्वरी
छिपाए हुए
तुम्हारा कवि
तुम्हें निज अंतर्मन में
अनजान पौध की कली
लगो तुम भली
बिना देखे जीवन में
खोज रहा ओ कली
तुम्हारा अली
तुम्हें हर वन मधुवन में
मिल जाओ ओ मौन
देख मैं कौन
इच्छुक तेरे दर्शन का
निकल के आ ओ चित्र
प्रकट , बन मित्र
तोड़ दे आज
चौखटा इस दर्पण का.
"गीत दूत"
मेरे उर के कोमल भावों
तुम गीत रूप में परिणत हो
जन-जन के मुख से मुखरित हो
मेरा संदेश-
मेरी प्रेयसी तक पहुँचा दो
मैं कमल क्रोड़ में बंद मधुप-सा
वह हरियाली में बंद कली
दोनों प्रतीक्षा-रत ,
कब आएगा प्यारा बसंत
कब आएगी वह ऋतु भली
जब मैं गुन-गुन करता , चहुँ ओर
उन अधरों का रस पान करूंगा
किंतु ज्ञात नहीं यह मुझको
वह किस बगिया की कोमल कलिका
और उसे भी ज्ञात नहीं है
कौन देश का उसका प्रीतम
किस दिशी से उसको आना है
ओ, गीतों ! ले वंशी की धुन
अनदेखी राधा से कहना
कोई तुम्हें पुकार रहा है
तुम तक आने को गुहार रहा है
जब प्रातः वेला में वह जाती होगी
शिव को अर्ध्य-दान करने
या तुलसी को जल देने का
नियम बनाया होगा
तो, मन में, प्रीतम से मिलने का
वर पाने की
उद्दीप्त कामना होगी
संजोई होंगी उसने भी कुछ अभिलाषाएं
उसने भी बनाई होंगी नयनों की भाषाएँ
स्वप्न में उसने प्रीतम का
आलिंगन पाया होगा
और स्वप्न टूट जाने पर
बहुत दुखी हो
उसने आंखों में रात बिताई होगी
मेरे गीतों! तुम्हारा स्वर सुन
जब उसका तन कम्पित होगा
उसकी उर लहरें मचलेंगी जब
किनारा पाने को
तब, वह पूछेगी तुमसे
तुम्हें किसने भेजा है?
कहाँ से लाये हो मधुर भावः,
मधु-कलश कहाँ सहेजा है?
तब निसंकोच बताना
दूर देश से लाये हैं
विरही का संदेसा
ओ कोमल केशा
वह, विरह वेदना से व्याकुल है
कमल क्रोड़ को छोड़
तुम्हें पाने आएगा
फिर तुम घूंघट से अपना
शशि-मुख दिखलाना
आलिंगन में बंध
अधर-सुधा-रस
पान कराना।
***************
"भावी"
ओ स्वप्न लोक की परी
तुम्हारी छवि
मेरे ह्रदय दर्पण में
ओ भावी हृदयेश्वरी
छिपाए हुए
तुम्हारा कवि
तुम्हें निज अंतर्मन में
अनजान पौध की कली
लगो तुम भली
बिना देखे जीवन में
खोज रहा ओ कली
तुम्हारा अली
तुम्हें हर वन मधुवन में
मिल जाओ ओ मौन
देख मैं कौन
इच्छुक तेरे दर्शन का
निकल के आ ओ चित्र
प्रकट , बन मित्र
तोड़ दे आज
चौखटा इस दर्पण का.
"गीत दूत"
मेरे उर के कोमल भावों
तुम गीत रूप में परिणत हो
जन-जन के मुख से मुखरित हो
मेरा संदेश-
मेरी प्रेयसी तक पहुँचा दो
मैं कमल क्रोड़ में बंद मधुप-सा
वह हरियाली में बंद कली
दोनों प्रतीक्षा-रत ,
कब आएगा प्यारा बसंत
कब आएगी वह ऋतु भली
जब मैं गुन-गुन करता , चहुँ ओर
उन अधरों का रस पान करूंगा
किंतु ज्ञात नहीं यह मुझको
वह किस बगिया की कोमल कलिका
और उसे भी ज्ञात नहीं है
कौन देश का उसका प्रीतम
किस दिशी से उसको आना है
ओ, गीतों ! ले वंशी की धुन
अनदेखी राधा से कहना
कोई तुम्हें पुकार रहा है
तुम तक आने को गुहार रहा है
जब प्रातः वेला में वह जाती होगी
शिव को अर्ध्य-दान करने
या तुलसी को जल देने का
नियम बनाया होगा
तो, मन में, प्रीतम से मिलने का
वर पाने की
उद्दीप्त कामना होगी
संजोई होंगी उसने भी कुछ अभिलाषाएं
उसने भी बनाई होंगी नयनों की भाषाएँ
स्वप्न में उसने प्रीतम का
आलिंगन पाया होगा
और स्वप्न टूट जाने पर
बहुत दुखी हो
उसने आंखों में रात बिताई होगी
मेरे गीतों! तुम्हारा स्वर सुन
जब उसका तन कम्पित होगा
उसकी उर लहरें मचलेंगी जब
किनारा पाने को
तब, वह पूछेगी तुमसे
तुम्हें किसने भेजा है?
कहाँ से लाये हो मधुर भावः,
मधु-कलश कहाँ सहेजा है?
तब निसंकोच बताना
दूर देश से लाये हैं
विरही का संदेसा
ओ कोमल केशा
वह, विरह वेदना से व्याकुल है
कमल क्रोड़ को छोड़
तुम्हें पाने आएगा
फिर तुम घूंघट से अपना
शशि-मुख दिखलाना
आलिंगन में बंध
अधर-सुधा-रस
पान कराना।
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