उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

भोली सूरत वाले ...............

भोली सूरत वाले चेहरे छुपे हुए रुस्तम निकले
चिंगारी जिनको समझे हम वो तो पूरे बम निकले

ग़ज़ल कहो या शायरी या कविता या हंसगुल्ले
प्रेम सुधा के पीने वाले वो मेरे हमदम निकले

जब तक तार छेड़े थे सागर में खामोशी थी
एक एक तर को छेड़ा तो लहरों के सरगम निकले

कोरा कागज़ लगती थी जो किताब पहले पहले
खोल के उसको देखा तो भरे हुए कालम निकले

आए भी वो गए भी वो इन थोड़े से लम्हों में
नयन विदा करने वालों के देखा तो पुरनम निकले


योगेश स्वप्न

12 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत उम्दा गज़ल है। पढ कर आनंद आ गया।आभार।

"अर्श" ने कहा…

ACHHI KAHI AAPNE ........BADHAAYEE SWIKAAREN...


ARSH

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र ने कहा…

भोली सूरत वाले ...वह जनाब क्या ख़ूबसूरत लिखा है . आनंद आ गया . पहले तो शीर्षक पढ़कर सोचा की यह गाना होगा भोली सूरत वाले ओ हो हो . धन्यवाद सर जी

विनय ने कहा…

Really good saahab!

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vandana ने कहा…

badhiya gazal

Puneet Sahalot ने कहा…

"भोली सूरत वाले चेहरे छुपे हुए रुस्तम निकले
चिंगारी जिनको समझे हम वो तो पूरे बम निकले"

ekdum dhamaake wali shuruaat rahi yeh to... :)

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह स्वपन जी..........पता नहीं कैसे नहीं देख पाया इतनी सुन्दर रचना...........
बहुत लाजवाब लिखा है

जब तक तार न छेड़े थे सागर में खामोशी थी
एक एक तर को छेड़ा तो लहरों के सरगम निकले

hempandey ने कहा…

'आए भी वो गए भी वो इन थोड़े से लम्हों में
नयन विदा करने वालों के देखा तो पुरनम निकले'
-सुन्दर.

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

जब तक तार न छेड़े थे सागर में खामोशी थी
एक एक तर को छेड़ा तो लहरों के सरगम निकले
स्वप्न जी

दो दिन से प्रयास रत हैं की आपकी युवा प्रेम अभिव्यक्ति को सराह सकूं । पर नित जाने किस तकनीकी गडबड से आपका ब्लॉग हंग हो जा रहा था ।

खैर इस ग़ज़ल में तर का प्रयोग बहुत ही खूब सूरत है , यहाँ एक बिंदास मनोभाव का बिम्ब भी दिखाई देता है ।

कोरा कागज़ लगती थी जो किताब पहले पहले
खोल के उसको देखा तो भरे हुए कालम निकले

बहुतशानदार ढंग से किया गया व्यंग्य ,एक बडे ही कठिन आक्छेप को इतने सरल सहज ढंग से निबाह दिया ,

बधाई

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

"भोली सूरत वाले चेहरे छुपे हुए रुस्तम निकले
चिंगारी जिनको समझे हम वो तो पूरे बम निकले"

दमदार शेर,

बधाई स्वीकार करें.

VIJAY TIWARI " KISLAY " ने कहा…

"स्वप्न" जी,
ग़ज़ल अच्छी लगी
खास तौर पर अधोलिखित शेर -जब तक तार न छेड़े थे, सागर में खामोशी थी
एक एक तार को छेड़ा तो लहरों के सरगम निकले
-विजय

shama ने कहा…

Yebhee rachnaa kitnee sundar aur sahaj hai..!