उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

यूँ तो हर रोज़ शाम आती है

यूँ तो हर रोज़ शाम आती है
मेरी तन्हाई कब मिटती है

मैं तो पीता हूँ कुछ शराब मगर
याद उनकी तो मुझको खाती है

उनसे मिलना तो अब हुआ मुश्किल
आखिरी आस एक पाती है

यूँ तो हैं फोन भी मोबाइल भी
नम्बरों की कमी सताती है

हमने सोचा था वो सदा देगी
पर क्या गूंगी कभी बुलाती है

इश्क की आग भी अजब शै है
जब बुझाओ भड़कती जाती है

अब तो बस देखना यही है स्वप्न
कैसे किस्मत हमें मिलाती है

योगेश swapn

4 टिप्‍पणियां:

"अर्श" ने कहा…

योगेश जी नमस्कार,
बहोत ही बढ़िया ग़ज़ल लिखी है आपने बहोत खूब..आप अन्यथा ना ले मगर मुझे ग़ज़ल के मतले के काफिये में कुछ गडबडी दिखी कृपया उसे सुधारले ... ढेरो बधाई और साधुवाद...

अर्श

विनय ने कहा…

लिखे जायिए निखार आ रहा है


------------------------
http://prajapativinay.blogspot.com/

mehek ने कहा…

waah bahut khub

प्रकाश बादल ने कहा…

योगेश भाई
, वाह क्या ग़ज़ल है।

लिखते रहें। आपको क्रिस्मिस की ढेरों बधाईयां।