उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

वो भंवर है..............

पिछली पोस्ट पर जिन महानुभावों /कवियों ने टिप्पणियाँ दीं और मेरी रचना को सराहा उन सभी का हार्दिक धन्यवाद, आप से आशा है ऐसे ही मेरा उत्साह-वर्धन करते रहेंगे, पुनः धन्यवाद सहित प्रस्तुत है एक नई
अर्थात २७.०३.२००९ को लिखी रचना। आपका स्वागत है.


मासूम एक चेहरा मेरा, कातिल बना है
मजबूर हूँ मैं, वो मेरी ,मंजिल बना है

है कौन सा रिश्ता मेरा, उससे ना जाने
गए हैं मेरे, होठों पर तराने
मकसद मेरा करना उसे, हासिल बना है
मासूम एक चेहरा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

वो मुझे घायल, किए जाता है ऐसे
जैसे आरी से कोई, लकड़ी तराशे
अब जुदा होना मेरी, मुश्किल बना है
मासूम एक चेहरा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बात दिल की है, वो दिलबर जानता है
दिल की हर धड़कन को ,वो पहचानता है
दिल चुरा कर वो मेरा, बेदिल बना है
मासूम सा चेहरा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

एक कशिश सी उसकी, है तीर_-नज़र में
एक खलिश सी है मेरे दिल--जिगर में
वो भंवर है पर , मेरा साहिल बना है
मासूम एक चेहरा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

14 टिप्‍पणियां:

"अर्श" ने कहा…

रचना में भावना को जिस तरह से आपने समर्पित किया है वो तो खुद पढने और समझाने लायक है .. अगर इस हलाकि लेखन में उम्र बंदिश में नहीं है मगर आपके लेखन और उतनी ही सोच की दाद देता हूँ के आप अपने उम्र के इस पडाव में भी इस तरह के रचना प्रस्तुत करते है ये वाकई सराहनीय है ... आप अपने दिल से किस कदर अब भी एक नव जवान है वो पढ़ते ही बन रहा है .... मैं आपके इसी सोच का कायल हूँ... एक बार मुझे कमेन्टआया था जनाब धीरू साहिब ने दिया था वो आज तक का बेहतरीन कमेन्ट लगा था मुझे अगर मेरे से पूछा जाये तो ... उन्होंने कहा था के अर्श अगर आप अपनी तस्वीर नहीं लगाये होते आपके लेखन सेये पता नहीं चलता के आपकी उम्र इतनी कम हे .... उसी तरह मैं ये कहता हूँ के अगर आप अपनी तस्वीर नहीं लगाए होते तो कोई नहीं कहता के आप इतनी अधिक उम्र के हे ... आप इसे अन्यथा ना ले वाकई आप दील से एक जवान कवि हे आपकी लेखनी को सलाम....


अर्श

mehek ने कहा…

बात दिल की है, वो दिलबर जानता है
दिल की हर धड़कन को ,वो पहचानता है
दिल चुरा कर वो मेरा, बेदिल बना है
sunder abhivyakti

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया लिखा है ... बधाई।

संध्या आर्य ने कहा…

ARSH JI ki bato se mai bhi sahamat hun ..........par is tarah ki arithirata se bache......

संध्या आर्य ने कहा…

ARSH JI ki baat se mai bhi sahamat hun........kavita achchhi hai ............bhagawan aapko bhawnao me sithirata pradan kare ..........aap apani blog ki gunwata ko banaye rakhe
...........

vandana ने कहा…

likhne ke bare mein to kehna hi kya
main bhi arsh ji ki baat se sahmat hun poori tarah se.

अल्पना वर्मा ने कहा…

एक कशिश सी उसकी, है तीर_ऐ-नज़र में
एक खलिश सी है मेरे दिल-ओ-जिगर में
वो भंवर है पर , मेरा साहिल बना है

-क्या बात है!
बहुत सुन्दर लिखा है.
'भावनाओं का समंदर जैसे कि बिखरा हुआ है.'

विनय ने कहा…

उत्कृष्ट रचना!

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

बेहतरीन भावाभिव्यक्ति के लिये साधुवाद स्वीकारें

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

Wah...

hempandey ने कहा…

'वो भंवर है पर , मेरा साहिल बना है'

-सुन्दर.

ओम आर्य ने कहा…

शायद कभी भंवर भी साहिल बन जाता है, आज ये नया नजरिया आपकी रचना से मिला.

Harkirat Haqeer ने कहा…

मासूम एक चेहरा मेरा , कातिल बना है
मजबूर हूँ मैं ,वो मेरी , मंजिल बना है

वाह जी वाह ... बहुत बहुत बधाई आपको......!!

Shama ने कहा…

ee baar aapke blogpe aayee hun...padha to janaa ki, aapke lekhanpe tippanee dun, itnee meree qabiliyathee nahee...zindadilee chhalaktee hai...dua kartee hun, ye pamane hamesha bhare rahen...