ढाई अक्षर प्यार का, ना कर सका कुछ


ढाई अक्षर प्यार का, ना, कर सका कुछ 


झूठ को सच, और सच को, झूठ करती आई दुनिया
बेशर्म, करते  हुए, ये सब,नहीं  शरमाई दुनिया

बेगुनाहों को, सजा मिलती रही,क्यूँ
कर सकी ना, आज तक भरपाई दुनिया

दीन दुखियों की सदा पर, ऊंघती,
और  पैसे की सदा पर,जाग कर उठ धाई दुनिया

ढाई अक्षर प्यार का, ना कर सका कुछ 
"स्वप्न " उसने पा के भी,ना ,पाई दुनिया

"स्वप्न" सच्चा जो,खुदा के सामने
उसने हो बेख़ौफ़, ये  ठुकराई दुनिया

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10 टिप्पणियाँ:

POOJA... ने कहा…

सही है... यहाँ प्यार करनेवाले बहुत कम हैं... इसीलिए इस दुनिया की नफरत ख़त्म ही नहीं होती...
बहुत खूब...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

झूठ को सच, और सच को, झूठ करती आई दुनिया
बेशर्म, करते हुए, ये सब,नहीं शरमाई दुनिया

बहुत सुन्दर रचना ! दुनिया पूजती है भगवान को पर मानती है शैतान को ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... स्वपन जी सही कहा है आपने ..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना ..

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

sach ko dikhatee bahut hee sundar rachna..

priya ranjan pandey ने कहा…

यहाँ गम ही जिंदगी है,
यहाँ गम ही आशिकी-
जहाँ कोई गम नहीं हो, मुझे ले चलो वहां|
हर कोई जीना चाहे,
पर जीने न दे किसी को-
ऐसी जिंदगी नहीं हो, मुझे ले चलो वहां|

निर्झर'नीर ने कहा…

आखिरी टुकड़ा बहुत ही ज्यादा कशिश भरा लगा

सतीश सक्सेना ने कहा…

यह सरल रचना , बहुत कुछ कह रही है !
शुभकामनायें आपको !

kshama ने कहा…

Bahut dinon baad aapne likha hai,lekin likha waaqayi behtareen hai!
Nahee,duniya nahee sharmati!

Hitesh ने कहा…

झूठ को सच, और सच को, झूठ करती आई दुनिया
बेशर्म, करते हुए, ये सब,नहीं शरमाई दुनिया

Sach hi hai swapn jee..
sundar prastuti .. badhai !

 

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