बेकरारों कि तरह अबकी दफा लगते हैं

बेकरारों कि तरह  अबकी दफा लगते हैं

हमको हर बार वो क्यूँ तस्वीर-ए-वफ़ा लगते हैं
हम तो सजदे में हैं वो हमसे खफा लगते हैं

जाने क्यूँ चाहे ये मन उनके लिए लुट जाना
सौदा घाटे का सही हमको नफा लगते हैं

कितनी शिद्दत से छिपाते हैं मेरा राज़ वो फिर
कैसे कह दूँ के हमें  बेवफा लगते हैं

कैसे कह दूँ कि उन्हें प्यार नहीं है हमसे
बेकरारों कि तरह अबकी दफा लगते हैं
             
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10 टिप्पणियाँ:

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बढ़िया रचना शर्माजी.. आभार

निर्मला कपिला ने कहा…

जाने क्यों----
कैसे कह दूँ
वाह बहुत सुन्दर शेर हैं। धन्यवाद।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब ...

वन्दना ने कहा…

वाह! बहुत दिनो बाद आपकी रचना पढने को मिली बेहद उम्दा प्रस्तुति।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बढ़िया गजल है!

kshama ने कहा…

Nihayat sundar rachana!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना!
--
इसकी चर्चा चर्चा मंच पर भी है!
http://charchamanch.blogspot.com/2010/11/337.html

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जाने क्यूँ चाहे ये मन उनके लिए लुट जाना
सौदा घाटे का सही हमको नफा लगते हैं

ये नफे का ही सौदा है स्वपन जी .... वो खुश तो सब जगत खुश .... बहुत दिन बाद लिखा है आपने कुछ .. कहाँ रहे अब तक .. आशा है सब कुशल से होगा ...

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल है !
बाल दिवस की शुभकामनायें !

निर्झर'नीर ने कहा…

हमको हर बार वो क्यूँ तस्वीर-ए-वफ़ा लगते हैं
हम तो सजदे में हैं वो हमसे खफा लगते हैं
exceelent

 

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