उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नव वर्ष २०१० की हार्दिक मंगलकामनाएं





नव वर्ष २०१० की हार्दिक  मंगलकामनाएं.


ईश्वर २०१० में आपको और आपके परिवार को  सुख समृद्धि , धन वैभव ,शांति, भक्ति, और ढेर सारी खुशियाँ  प्रदान करें .

योगेश वर्मा "स्वप्न"

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

सारी गोपियाँ कहें मोहे, सांवरो कन्हाई

लीजिये प्रस्तुत है "श्याम श्याम  भजो" कैसेट से एक और रचना.

सारी गोपियाँ कहें मोहे,सांवरो कन्हाई

सारी गोपियाँ कहें मोहे,सांवरो कन्हाई
सारी गोपियाँ कहें मोहे, सांवरो कन्हाई
मोहे तू ही बता दे ,मैं का करूँ माई (२)
सारी गोपियाँ कहें..............................

सांवरो कह के , मोहे खिझावें
माखन चोरी,नाम लगावें
मैंने तोडी नहीं मटकी, दही ना चुराई
सारी गोपियाँ कहें.................................


सांवरो मेरा, नाम रहेगा
कृष्णा मुझको ,कौन कहेगा
बेर बेर मैया मोहे, आवे है रुलाई
सारी गोपियाँ कहें................................

और कहें तो,छोड़ भी दूं मैं
सबसे नाता ,तोड़ भी दूं मैं
सांवरो कहे मोहे , मेरो दाऊ भाई
सारी गोपियाँ कहें................................


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शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

कहता है दिल करे यूँ शिकायत कभी कभी

कहता है दिल करे यूँ शिकायत कभी कभी

कहता है दिल करे यूँ,शिकायत कभी कभी
उसमें भी हो छिपी-सी,मुहब्बत कभी कभी

हो प्यार में अगरचे ,अदावत कभी कभी
उस पर भी हम करें एक ,दावत कभी कभी

इन्सां पे रब की हो यूँ, इनायत कभी कभी
पहुंचे जो रूह तक भी ,राहत कभी कभी

बन्दों की ऐसे लाजिम  ,हिमायत कभी कभी
मज़हब की तोड़ दें जो ,रवायत कभी कभी

हो जिक्र गर खुदा की, बाबत कभी कभी
तो मानें कृष्ण की भी ,हकीकत कभी कभी

कुरआन की पढ़ें यूँ ,आयत कभी कभी
गीता ज्यों बाँचने की, चाहत कभी कभी

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आज अभी कुछ देर पहले समीर जी (उड़न तश्तरी) के ब्लॉग पर था उनके लैपटॉप को श्रधांजलि देने के बाद कुछ दिन पहले लिखी अपनी ये पंक्तियाँ  याद आ गईं  सो आज बड़ा दिन भी है एक के साथ एक फ्री 

नहीं चाहते हुए भी सब कुछ सहना पड़ता है


नहीं चाहते हुए भी सब कुछ सहना पड़ता है
सुख में दुःख में इस दुनिया में रहना पड़ता है

प्यार अगर है तो मुख से भी कहना पड़ता है
रीत-रिवाजों की धारा में बहना पड़ता है

कितना भी हो प्यारा रिश्ता ,चट्टानों-सा दुनिया में
एक रोज़ निश्चित उसको भी ढहना पड़ता है


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बुधवार, 16 दिसंबर 2009

आदमी

आदमी(इंसान नहीं )
 
आदमी को मार कर खायेगा आदमी
एक दिन ऐसा भी अब आएगा आदमी


जानवर को मात कर जाएगा आदमी
अपना असली रूप दिखलायेगा आदमी


बेशरम हो अब ना शरमाएगा आदमी
और रब से भी ना घबराएगा आदमी


कैसे कैसे ज़ुल्म अब ढाएगा आदमी
ज़ुल्म-ओ-सितम की आग बरसायेगा आदमी


आँख में फूले फलेगा बाल सूअर का
जब भी नेता बन के आ जाएगा आदमी



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मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

मज़ा कुछ और है

चलिए ब्लॉग के दूसरे वर्ष कि  शुरुआत करते हैं आजही लिखी इस रचना से. आज  अरहर कि दाल और चावल खाने कि इच्छा हुई  सुबह सुबह पत्नी से कविता में इसकी मांग कर बैठे , मांग क्या कर बैठे  मुखड़ा भा गया और इस रचना ने पदार्पण किया , गौर फरमाएं.

मज़ा कुछ और है 


अरहर कि दाल, चावल , और संग हो मांडिया
साथ हो चटनी पुदीने की, मज़ा कुछ और है

उच्च कुल की हो , गुणी हो , सभ्य हो
पत्नी हो शिक्षित नगीने -सी , मज़ा कुछ और है

बाप हो सूफी , हो शादी पूत की
और करे वो बात पीने की, मज़ा कुछ और है

एक दिन महीने में वेतन क्या मज़ा
हर तिथि , वेतन, महीने की, मज़ा कुछ और है

ईंट और रोड़ा , कहीं का जोड़ कर
कोशिशें हों जब , करीने की, मज़ा कुछ और है

रोग हो घातक , खड़ी  सिर मौत हो
और हो फिर बात, जीने की, मज़ा कुछ और है

हो शहादत देश की खातिर अगर
और निशानी, ज़ख्म, सीने की, मज़ा कुछ और है

प्यार हो सबसे , खुदा का नाम हो
सैर, फिर मक्का-मदीने की, मज़ा कुछ और है

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गुरुवार, 26 नवंबर 2009

थाम लिया है आँचल, अबकी बार ना छोड़ेंगे

प्रस्तुत है एक और गीत पुरानी डायरी से.



 थाम लिया है आँचल, अबकी बार ना छोड़ेंगे


थाम लिया है आँचल, अबकी बार ना छोड़ेंगे
ले जायेंगे उस पार तुम्हें, इस पार ना  छोड़ेंगे

तुमको पाकर सदियों की, भटकन को मिल गया विराम
दिल को मिला सुकून, हुए सच स्वप्न तमाम
बाँध लिया है बिना डोर के, बंधन में तुमको ऐसे
राधा के संग श्याम का, जुड़ा हुआ हो जैसे नाम
तोड़ेंगे सब रिश्ते जग, के प्रीत ना तोड़ेंगे

थाम लिया है आँचल, अबकी बार ना छोड़ेंगे
ले जायेंगे उस पार तुम्हें, इस पार ना  छोड़ेंगे


एक नज़र ने कर दिया है, क्या कमाल देख लो
क्या जहां में इस तरह की, है मिसाल देख लो
प्यार का इस जहां पे, हो रहा है यूँ असर
जादूगर का जैसे कोई, हो कमाल देख लो
प्रीत की राहों से अपने, कदम ना मोड़ेंगे

थाम लिया है आँचल, अबकी बार ना छोड़ेंगे
ले जायेंगे उस पार तुम्हें, इस पार ना  छोड़ेंगे


तोड़ के जग के सारे नाते, एक दिन तो आना होगा
प्रीत का गीत मेरे संग मिलकर, एक दिन तो गाना होगा
एक दिन तो मेरे भी घर में, होगी प्यार की दीवाली
दो प्यासी रूहों को आखिर, एक दिन मिल जाना होगा
टूटे ना ये प्रीत, दिलों को, ऐसे जोड़ेंगे

थाम लिया है आँचल, अबकी बार ना छोड़ेंगे
ले जायेंगे उस पार तुम्हें, इस पार ना  छोड़ेंगे





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शनिवार, 21 नवंबर 2009

पिघला दें ना ह्रदय तुम्हारा

 प्रस्तुत है कई वर्ष पहले लिखी एक रचना. जो मुझ बहुत पसंद है , शायद आपको भी पसंद आये.

पिघला दें ना ह्रदय तुम्हारा


..
पिघला दें ना ह्रदय तुम्हारा , जब तक मेरे नगमे गीत
तब तक चैन नहीं पाऊंगा, मेरे रूठे बिछुड़े मीत
पिघला दें ना ह्रदय तुम्हारा तुम्हारा........................
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जब तक मेरे गीत तुम्हें, मेरे द्वारे तक ना लायें
चारों और तुम्हारे , मेरे गीतों के होंगे  साए
एक दिन तो पहचानोगे तुम, एक पागल की पागल प्रीत
पिघला दें ना ह्रदय तुम्हारा तुम्हारा...........................

सपनों में भी गीत सुनाकर, तुम्हें नहीं सोने दूंगा
जनम जनम के साथी को क्या, ऐसे ही खोने दूंगा
हार के दिल आ जाओगे जब, होगी वही तुम्हारी जीत
पिघला दें ना ह्रदय तुम्हारा तुम्हारा............................

कृष्ण सरीखा आकर्षण  तो, नहीं है मुझमें, गीतों में,
राधा- सी आ जाओ पर तुम , क्या रक्खा है रीतों में
सपना हो जाएगा पूरा, गीतों का पाकर संगीत
पिघला दें ना ह्रदय तुम्हारा तुम्हारा............................

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गुरुवार, 5 नवंबर 2009

हँस के गुजार दी कभी रो के गुजार दी

हँस के गुजार दी कभी रो के गुजार दी
जिंदगी हमने तेरे,होके गुजार दी

तुझको यकीन हो ना हो , लेकिन है सच यही
हमने तो अपनी जिंदगी तुझपर निसार दी

इश्क में तूफ़ान आना, लाज़मी, मालूम था
कश्ती समंदर में तिरे भरोसे उतार दी

चाँद तारों की तमन्ना की नहीं तेरे सिवा
किस्मत, हमारी याद भी, तूने बिसार दी

यूँ तो यकीन पर है ये दुनिया टिकी हुई
वापस यकीन टूट कर, पाई , उधार दी

मुजरिम हुआ हूँ जब से मैं इल्जाम-ए-इश्क का
दुनिया की थोडी लाज थी , वो भी उतार दी

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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2009

खोजता था अपना नाम .............

खोजता था अपना नाम उसके हाथों में कहीं
क्या लकीरें इश्क की , हाथ में होती नहीं हैं?

सोचता था स्वप्न में ही उससे मिल आऊं कभी
पर सुना है  वो दीवानी आज कल सोती नहीं है

अश्क बनकर बरस जाऊं उसकी आँखों से कभी
मेरी किस्मत, मौन है वो, आजकल रोती नहीं है

सीपियाँ तो खोज लाया मोतियों की चाह में
देख कर हैरां हूँ इनमें बूँद हैं मोती  नहीं है

मैं तो मिटना चाहता था एक पतंगे की तरह
उस शमा में मोम तो है ,ज्योत है, ज्योति नहीं है

मैंने कितने बीज खुशियों के दिए उसको मगर
क्यूँ दबा देती बरफ में , बीज, क्यूँ बोती नहीं है


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 मेरा http://swapnyogeshverma.blogspot.com/  ब्लॉग भी देखें.
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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

कुछ दोहे

जो अपनी औकात में रहकर करता बात
उसको सभ्य समाज की पड़े कभी ना लात

भूल गया निज वक़्त तू कुर्सी पा भरमाय
घूस खाए चोरी करे सबकी लेता हाय

तुझको लगता था बुरा, जो औरों का कर्म
वही कर्म अब तू करे , गई कहाँ तेरी शर्म

कुर्सी के बल कूदता , कहाँ गए संस्कार
 "केवल" कुर्सी छोड़कर ,पायेगा तिरस्कार

ये शतरंज का खेल है, खा जायेगा मात
सवा सेर है सेर को, गाँठ बाँध ले तात

रहे सुरक्षित वो सदा , झुका हुआ जो वृक्ष
तने हुए को काटना , है समाज का लक्ष्य

देने को कुछ है नहीं , बोल तो मीठे बोल
अरे  जाग अब त्याग दे , अंहकार का खोल
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कुछ दोहे लिखने की कोशिश की है कहाँ तक सफल हूँ , पता नहीं ,कुछ ख़ास नया भी नहीं दे पाया हूँ  पाठकों से विनम्र निवेदन है कमेंट्स  देते समय प्रशंसा करें ना  करें , कोई भी कमी  देखें ज़रूर बताएं,  मुझे उस कमी को दूर करने में सहायता मिलेगी, मैं आपका ह्रदय से आभारी हूँगा. धन्यवाद.