उपरोक्त शीर्षक चित्र श्री श्री राधा श्याम सुंदर , इस्कान मंदिर वृन्दावन, तिथि 15.04.2010 के दर्शन (vrindavan darshan से साभार ).

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

ख्वाब और हकीकत का, मेल है दुनिया

ख्वाब और हकीकत का, मेल है दुनिया
खुदा का निराला ये, खेल है दुनिया

कोई रहा है , कोई जा रहा है
सभी हैं मुसाफिर, रेल है दुनिया

अगर जल रहा है ,दीपक तो समझो
है ज्योति उसी की,तेल है दुनिया

जो मुलजिम होते, कभी भी ना आते
हैं मुलजिम खुदा के, जेल है दुनिया.

कीमत यहाँ गिर गई, आदमी की
सस्ते में बिकता है ,सेल है दुनिया

वहीँ पर पड़ी है, ज़रूरत खुदा की
जहाँ कुछ भी पाने में, फ़ेल है दुनिया

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

अपने प्रेमी जन की सुध ले अब तो धीर बंधा जा रे (कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष।)

कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

(भगवन कृष्ण के गोकुल से मथुरा गमन के बाद का शब्द चित्र ।)

तेरे बाबा करे हैं याद तुझे अब तो मोहन घर आ जा रे
दिल से आंसू की धार बहे , अब तो गले लगा जा रे

सूना -सूना लगता गोकुल
जड़ चेतन सब हैं अति व्याकुल
सुध-बुध खो तेरी मैया कहे, चंदा-सा मुख दिखला जा रे
तेरे बाबा करे हैं..........................................................

भोजन में अब स्वाद नहीं है
तुझे किसी की याद नहीं है
माखन मिश्री करें प्रतीक्षा, आकर भोग लगा जा रे
तेरे बाबा करे हैं.......................................................

तेरी सब गैया रोती हैं
शुक मयूर सब मौन हो गए
ग्वाल बाल सब चीख रहे हैं, आकर गाय चारा जा रे
तेरे बाबा करे हैं......................................................

सभी गोपियाँ तड़प रही हैं
राधा बावरी भटक रही है
अपने प्रेमी जन की सुध ले , अब तो धीर बंधा जा रे
तेरे बाबा करे हैं........................................................
**********



स्वतंत्रता दिवस पर एक प्रश्न

देश प्रेमी हो तो बोलो देश की खातिर क्या दोगे?
रक्त के अतिरिक्त इस पर और क्या अर्पित करोगे?

दे सको तो मानसिक संकीर्णता दे दो
धर्म की नीवें हिलाती जीर्णता दे दो

जो अहिंसा को मिटाए क्रोध दे दो
सत्य को झुठलाये ऐसा बोध दे दो

कुटिल ह्रदय के सारे तुच्छ विचार दे दो
पाप को जो मूल भ्रष्टाचार दे दो

सौगंध लो ये सब नहीं देते डरोगे
देश प्रेमी हो तो बोलो देश की खातिर क्या दोगे?

देश प्रेमी हो तो बोलो देश की खातिर क्या दोगे?
रक्त के अतिरिक्त इस पर और क्या अर्पित करोगे?

********

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

कौन हो तुम ?

एक जिज्ञासा ह्रदय में
आज उठ आई कहाँ से
कौन हो तुम?

मैं खोजा किया तुमको
स्वप्न में
कल्पना में
गीत में
प्रीत में
आह में
आल्हाद में
किंतु
भटका फिर रहा हूँ मौन
प्रश्न का उत्तर
नहीं मैं पा सका हूँ
कौन हो तुम ?

यह तो निश्चित है की तुम हो
पर कहाँ हो?

मेरा स्वर टकरा कर
मुझसे अचानक
आ गया मेरे ही पास
जब पुकारा मैंने तुम्हें
तब लगा जैसे हो तुम मेरे ही पास
वह स्वप्न था
सत्य की परिधि में बंधा सा
स्वप्न खंडित हो चुका था
इससे पहले कि,
मैं, यह पूछता
तुमसे

अचानक!

कौन हो तुम?

रविवार, 2 अगस्त 2009

अर्थ की ख्वाहिश ने क्या-क्या कर दिया

अर्थ की ख्वाहिश ने क्या-क्या कर दिया
दिल था एक मासूम पत्थर कर दिया

था गगन छूने का भी दम-ख़म मगर
जालिमों ने काट एक-एक पर दिया

प्यार कर बनने लगा जो देवता
उसके सीने में भी खंजर कर दिया

जो स्वपन देखा वही टुकड़े हुआ
आँख में अश्कों का निर्झर भर दिया

जिसकी  खातिर वो लड़ा, लड़ता रहा
 उसने ही साबित सितमगर कर दिया

थी डुबोने को बहुत एक लहर ही
ज्वार-भाटा और समंदर कर दिया

बागबां कैसे मिले उसको "स्वप्न"
खिल रहे गुलशन को बंज़र कर दिया


***********

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

शोक (प्रार्थना)

मेरे पिताजी जो २८.०६.2008 से बीमार , अस्पताल में थे , का देहांत १३.०७.२००९ सोमवार को हो गया, उन्हें बचाने के सभी प्रयत्न विफल हुए, शायद यही ईश्वर की इच्छा थी.
एक प्रार्थना , मेरी छोटी बहिन सुनीता वर्मा द्वारा लिखित , जो अध्यापिका है।

ना हमारे पास स्वर ना शब्द के भण्डार हैं

ना हमारे पास स्वर ना शब्द के भण्डार हैं
गा रहे हैं जो ह्रदय के भाव हैं उदगार हैं

ना दिया बाती जला कर आरती को लाये हैं
नयन के दीपक में तेरी ज्योत के आधार हैं

फूल भी कोई नहीं चरणों में जो अर्पण करें
दो सुमन लाये हैं एक श्रद्धा है दूजा प्यार है

रूप गुण तेरे प्रभु हम गान कर सकते नहीं
नाम तेरे अनगिनत अनगिन तेरे आकार हैं

द्वार तेरा छोड़ कर किस ठौर जाएँ हम भला
एक तुम ही बंधु हो बैरी सकल संसार है

प्रार्थना ये है हमारी ज्ञान हमको दीजिये
निज शरण ले लीजिये प्रभुजी तो बेडा पार है.

**********

बुधवार, 1 जुलाई 2009

कौन है?

कौन है ईश्वर कभी जब सोचता हूँ
स्वयं से ही प्रश्न कितने पूछता हूँ

कौन है सृष्टि को रचता जा रहा है
कौन जो देहों में बसता रहा है

किसके आदेशों से पृथ्वी घूमती है
किसके डर से सूर्य तपता रहा है

कौन आंधी और तूफां को चलाता
ज्वालामुखी पर्वत को जो पिघला रहा है

कौन सुनता है ह्रदय की चीत्कारें
अपने भक्तों पर कृपा बरसा रहा है

रविवार, 14 जून 2009

मेरे श्याम..........

बहुत हो चुकी आँख मिचौनी , दूरी आज मिटाओ श्याम
मुझसे आकर मिलो यहाँ या, मुझको पास बुलाओ श्याम
मेरे श्याम, मेरे श्याम,मेरे श्याम,मेरे श्याम,मेरे श्याम

दूर -दूर रहते रहते तो दूरी बढती जाती है
तुम तो आते नहीं तुम्हारी,यादें बहुत सताती है
दिव्य नेत्र दे दो आँखों से पर्दा ज़रा हटाओ श्याम
मेरे श्याम.........................................................

दूर बज रही वंशी की धुन मुझको पास बुलाती है
कभी सुनाई देती मुझको और कभी खो जाती है
आओ मेरे निकट बैठ कर वंशी आज बजाओ श्याम
मेरे श्याम......................................................

भव सागर में भटक-२ कर देखा सब कुछ झूठा है
मोहन तेरी शरण में सुख है, सुख का सपना टूटा है
कृपा करो मुझपर भी अब तो अपनी शरण लगाओ श्याम
मेरे श्याम.....................................................

मेरी तो अभिलाषा मोहन अब तुम में मिल जाना है
थका -थका नदिया का जल हूँ, सागर आज समाना है
सागर में मिलने दो मुझको , "मैं" को आज मिटाओ श्याम
मेरे श्याम...................................................

रविवार, 7 जून 2009

"स्वप्न" कोई ना हुआ हमारा दुनिया में

अभी ०५-०६-२००९ को बेटे के कॉलेज से सम्बंधित किसी कार्य वश जयपुर जाने का अवसर मिला. शाम को एक मंदिर में गए भीड़ भाड़ के बीच एक शख्स जो सीनियर सिटिज़न थे लगभग ६५-७० वर्ष के, एक कार के पास खड़े कार वाले से कुछ बात कर रहे थे, कुछ क्षणों में कार मालिक ने कुछ रूपये उन्हें दिए और वो एक तरफ हो गए,स्पष्ट रूप से भीख ही थी क्यूंकि दो तीन लोगों से इसी तरह भीख मांगी थी, वे सज्जन किसी भले परिवार से लग रहे थे, मुझसे रहा न गया , क्षमा मांगते हुए उनसे पूछ बैठा उन्होंने अश्रु भरे नेत्रों से जो जवाब मुझे दिए, उन सभी को कविता/गीत के माध्यम से व्यक्त करने की कोशिश की है कहाँ तक सफल रहा हूँ ये तो आप ही देखें, मेरी उनसे क्या बात हुई होगी आप स्वयं समझ जायेंगे सच मानिए ये उन्ही सज्जन के विचार हैं, मैंने बस कविता में ढाल दिए हैं.

"स्वप्न" कोई ना हुआ हमारा ,दुनिया में.

भीख मांग कर करो गुज़ारा दुनिया में
अगर तुम्हारा नहीं सहारा दुनिया में

पेट तो मांगेगा ही उसकी गलती क्या
इस दुनिया में सदा किसी की चलती क्या
शर्म-ओ-हया से करो किनारा दुनिया में
भीख मांग कर करो..............................

किस्मत ऐसा समय, दिखाती जीवन में
कभी महल में वास, कभी होता वन में
कभी बादशाह,कभी बेचारा दुनिया में
भीख मांग कर करो..............................

दूध निकलता नहीं , गाय के, जब थन से
त्यागा करता ग्वाला , उसको तन मन से
कूड़ा घर फिर बने, सहारा दुनिया में
भीख मांग कर करो.............................

बोए थे जो फूल समझकर, कांटे थे
सहन किये जो प्यार समझकर, चाँटे थे
"स्वप्न" कोई ना हुआ हमारा दुनिया में
भीख मांग कर करो...............................

संयोग देखिये ०६-०६-२००९ को जयपुर के एक प्रमुख समाचार पत्र के मुख प्रष्ठ पर संलग्न सन्देश प्रकाशित हुआ मैं उस सन्देश की कट्टिंग ले आया परन्तु समाचार पत्र का नाम लिखना भूल गया.( जयपुर के किन्ही पाठक को यदि उपरोक्त समाचार पत्र का नाम पता हो तो बताएं, मैं इसमें नाम स्पष्ट कर दूंगा) मैंने उसकी प्रति यहाँ दिखने की कोशिश की है.
मेरा इ मेल. yogesgverma56@gmail.com

मंगलवार, 2 जून 2009

एक गीत अपने देश के लिए

अब तो अपने भारत का भी , दुनिया लोहा मान रही है
नई नज़र से नए सिरे से , भारत को पहचान रही है


लाखों दाग चाँद में लेकिन, चाँद अभी भी क्यूँ भाता है
सबको ललक उसे पाने की, हर कोई क्यूँ अपनाता है
ऐसी हस्ती, ऐसी शक्ति, अब सबका अरमान रही है

अब तो अपने भारत का..........................................

देता आया अब तक सब को, अब भी देना है जारी
भारत से भारत-रस लेना , दुनिया की है लाचारी
गुरु था वो, गुरुतम अब होगा, भारत की जो शान रही है

अब तो अपने भारत का........................................

अब सम्रद्ध देश है अपना, नित नूतन हैं अभिलाषा
आसमान छू लेगा एक दिन, हमको है पूरी आशा
भारत माता सोने की, चिडिया बनने की ठान रही है।

अब तो अपने भारत का ......................................

शुक्रवार, 29 मई 2009

कौन कहता है मैं कहता हूँ ग़ज़ल

कौन कहता है मैं कहता हूँ ग़ज़ल
मुझको लगता है ये शब्दों का puzzle

तुमको लगता होगा मुश्किल काम ये
मुझसे गर पूछो तो है बिलकुल सरल

गीत कविता और ग़ज़ल सब एक हैं
दिल अगर श्रोता का जाता है बहल

दर्द का रिश्ता अजब है शायरी से
उम्दा शायर वो जो पीता हो गरल

शायरी जो, झनझना दे दिल के तार
जिसको सुनकर आँख हो जाए सजल

दर्द और आंसू की वर्षा में पकी
मौसमी होती नहीं इसकी फसल

दिल कभी जब प्यार से लबरेज हो
तो बिना मौसम खिले कविता-कमल

जब कभी लिखता हो कुछ कोई कवि
पाप होगा तुमने गर डाला खलल

है दखल इसमें "अकलमंदों" का भी
दूसरों की शायरी करते नक़ल

ये तसव्वुर की करामातें हैं "स्वप्न"
बस ख्यालों में ही बन जाता महल